दोपहर को अँधेरा | Dopahar Ko Andhera

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Dopahar Ko Andhera by यमुनादत्त वैष्णव - Yamunadatt Vaishnav

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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+ दोपहर को श्घेरा । । १७ 1 कदा धद श्रफसर बनने के लिए, ब्रिज खेलना बहुत जरूरी है | बह था विश्वेश्वर, दस स्कूल का साधारण श्रध्यापक | इसी कलत्र से न्रिज सीखकर्‌ दलकः शहर गया । बद्धा मान दै ब्रहम उसक्रा। ब्रिज के लिए. कमी जज साहब के यहाँ से बुलोश्ा आता है तो कभी मैंजिस्ट्रेट के घर से । बड़े लोगों में घूमता-पिरता है, जं। चाही बह काम करा लेता है | मे स्थान में नियुक्ति के कुछ साहा उपरान्त तक तो श्रपनी मंडली के सभी कमबारियों को सठल्ले बैठे दंख बह सोचता कि इस तहसील कं। ही लोड देना चाहिए; । जम यहाँ करने को कुछ काम ही नहीं है तो इतने श्रप व्यय ` की क्या शानश्यकता ? स्वयं श्रपने बिपय में वह प्रश्न करता, शुभे श्राज' वेतन के २४० रुपए मिले । भत्ते श्र मकान, नौकर श्रादि सुविधाश्रों सहित तीन सी सपए, मासिक होते हैं । दस रुपए दिन । दस रुपए, मजदूरी पाने 'योर्य मैंने कौन-सा कठिम काम किया १ क्या इस श्रनधिकार प्राप्ति काकभी / प्रोयशिलेत मे करना पढ़ेंगा ¢ ताश के खेल में तन्मय श्रपने साथियों का कभी एक-दूसरे की तनिक-सी, ठीक समय पर ठीक पत्ते को ने गिराने की, गलती पर उत्सेजित होकर बिगड़ पढ़चा' उसे ऐसा निस्य॑क, उपहास्य श्रौर शिषु-मुलभ लगता कि बह खीर यकृता । भरसे तौ उसके श्रगादीपन के कारण कोई भी .उसे श्रपना खेल का - साथी बरमाने को उत्सुक ने रहता, किन्तु कभी-कभी चतुरंग के पूरा न होने पर उसे खेलना ही पढ़ता | खेल की ्यर्थता से उत्पन्न खीक और श्रात्मग्लानि की बह ष्ुस एकमात्र सम्तोप्र से शमन करने का प्रयत्न करता कि दशनलाल भी इस दल का सदस्य था; तथा दशनलाल क्या करता, कैसे रता था, किस व्यक्ति से कैसे व्यवहार करता था, यह सब बातें बह मंडलो में सम्मिलित होकर बिना अपनी सौर से प्रश्न किये ही जान लेगा । यह लाम इस मंडलीमें ररे से श्रवश्य हिता है । दर्शनलाल के कार्य-कलाप म उसकी जिज्ञासा का कारण था इस नयी तहसील भ म। लगभग उन्हीं ऋंकटी मामलों का श्रभ्तित्य जिनके कारण बह सुमस्तपुर में लोकप्रिय न बन सका था | उसे श्रापने उष्य श्रधिकारी के षे शब्द स्मस्‌ द श्राति करि प्रजा की सैबा प्रजा करौ प्रसन्न करके ही कौ जानी बिः |




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