बृहत हिंदी कोश | Brahat Hindi Koush Ac 4503

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Brahat Hindi Koush Ac 4503 by पं. कालिकाप्रसाद - Pt. Kalikaprasadमुकुन्दीलाल श्रीवास्तव - Mukundilal Srivastava

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मुकुन्दीलाल श्रीवास्तव - Mukundilal Srivastava

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श ~ ~ ~~ => थे जा भग - भनार अमदो ह ¦ -र ~प श्य दं होना; माकि | गवां - लौ” जनहा ताव अगो ताननाः दहा कटमेनाका नौकर । स्कः -सर्दौ (दिन्‌) -प० माणि करनेवाला नौकर 1-मसदन-पु० माकिश । -संचे-पु० गठिया रोग । -यषश्टि-खी° पतली आति । ~-श्क- प० शक्षविशेष । -रक्षक-पु० राजा महाराजा आदि बडे आदमियोकी रक्षापर नियुक्त जन, मशै-गाद (दसा?) । रक्षणी, रक्षिणी -सी० केहेकी जालीका बनी हुआ बम, भिरह, बख्तर; पोक्षाकं । -रक्षा-स्री शरीरकी रक्षा 1 दसं -पु० पत्ती, फल आदिक कुटकर निचोडा हुआ रस । -रागश- पृण सुगंभित केष यां उबटनः; इनका केषनं । -राञ्ज-पु० भंग देशका राजा; कर्णं या कोभ- पदे । -र्ह -पु० बालः ऊन । -ङेष-पु० दै० “जय राग ) -छोडय -पु० वृविदोष। -विकर-बि० विकलांग; मूर्छित ¦ -विकृति-स्त्री देहमें कोई विकार होना; भिरमीकी भीमारौ । -विक्षेप-पु० बोलने; गाने आदिते हाथ वैर, सिर भादि हिराना; नृत्य । -विद्या- श्री कानके साधनभून व्यकिरण आद्रि क्षाल्य; प्रइन कारूमे अंर्गोकी चेष्टा या अगेकि चि देखकर श्ुमाश्चुम कहनेकी विया । -विश्चम -पु० अगज्ंति, एक रोग । -बैकृत-पु० सकेत या मुखमृद्रा हारा आंतरिक मार्वोका प्रकाश । -हुद्धि-स्त्री स्नानादि ढारा झरीर की शुद्धि । -शैथिल्य-पु० शरीरका ढीलापन । -झोष- पु० सूखा या सुखटी नामफी बीमारी । -खंग-पु० सभोग,; शरीर- मग । -संरिनी-वरि° स्त्री अंग-संग करसेवाली 1-संगी - (गिन) - त्रि” भंग-तग करमेवाला । -संशारन -पु° हाथ-पाथ आदि हिननेकी क्रिया! -संि-ली० दे मध्यग । ~ संस्कारं -पु० देहवो सवारना, मजाना, बनाव- मिगार । -संहति-खी° अगसमष्टि; अर्गोकी नाटः; छीटाई-बडाईका मेल, गठन | -सख्य-पु० प्रगार मैत्री । -सिहरी-स्त्री हि] जड़ेया बुस्वारकें पहलेकी केंपकॉपी : जूरी । -सेवक-पु० निजी सेवा-टहल करनेवाला नौकर । -सौष्व -पृ० अंगोकौ बनाबरकी सुंदरता । -स्पशं - पु० झरीरका रपर्श- अशौचयुक्त न्यक्तिका दूसरोंके छूने योग्य हौ जाना) -हानि-स्वी० उगगविशेषकी हानि: विकृनिः; मुख्य ककि सहायक कमको न करनाया दीक तरे न करना । हार -पु० अगविक्षेप; नृत्य । -हारि- सी° रग-भूमि । पुण दे° अंगहार' । -हीन -वि° अंग विशेष रहित विकलांग; उपकरण-रहित (पूजा इ०) । पु० अनेय, कामदेव । मयुर - करना - स्वीकार करना । इना - कमम खाना ! -टटना -अगडाईं आना; ज्वरके पने देह दूना (१) । -धघरना- पहनना; धारण करना । (फूले) -न समाना- अत्यंत प्रसन्न होना ।-मोबना -रुज्जासे देह सिकोरना। अंगढाई लेना ।-खगनां-किपटना।आदार- का पचकर देहकी पुष्टि करना; परचना । -कछगाना- लिपटाना; परचाना: विवाहमें देना 1 -पुर अंगोंगा । अंगक-पु० (सं०] अंगः शरीर । स्त्री दे० 'अंगजाः । अंगद-संगङड ~ वि० टरा-कृराः बचा-सुचा । पृ० हयक मामन । टूटना । मु०-तोचना - भेंगडाई लेते समय किसीके कवेपर हाथ रखकर अपनी देहका भार देना (जो आमतौरपर ममहूस समझा जाता हैं? कुछ काम न करना ! डैँगढाना-भ० घि? अंगडाई लेना । अंगढ़-पुर सिं०] दे० 'अंगन' । अमति ~-पु० [सं०) मम: अभिहीत्र: नहा; “विष्णु+ सवारी; यान । अंगद-पु० [सं०) बाजूंद, बविजायठ बालिका बेटा; छक्ष्मणका एक पुत्र: दुर्योधनके पक्षका ण्क योद्धा । अंगदीया-खी० [सं०] लक्ष्मणकें पुत्र भंगदकों मिले राज्य- (कारुपथ)की राजधानी 1 अंगन~-पु० [मे०] उ्हलनेकां स्थान; ऑगन, चौक; टहलना; यान, सबारी । अंगना-स्त्री [मं०] सुद्र अर्गोवाली सी; शौ; करप्रिया स्त्री; उन्तर दिश्चाके दस्तीकी नायी । -गण - पुर खियेका समूह । -जन -पु० ललवरगं । -ग्रिय - पु० दीक वृक्ष । गना -पु० दे? “आँगन । अँगनाइई*- सी भीतर या जनानखानेका ऑँगन अँगमैया† - खी 2० (ओंगन' । खगर्थीक-पु० [५1०] दाद । शगरला-पु० एक रगा बढददार मर्दना पहनावा, भगा, चपकान ! अँगरा। -पु० अगार; बैठोंके पैरमें दर्द होनेका एक रोग! भगारना०-अ० क्रि० दे० अगडाना' सँगरी*-स्त्री० जिरह, बस्तर: गोदकें चमड़ेका दस्ताना 1 अँगरेज-पु० इंग्लैड देशका रदनेवाला, 'इग्लिशमैन' । ंगरेजियत-सखी° अगरेजपन, भगरेनी चाल-ढार । अगरेजी - वि० अगरेज-सबधी; अगरेजका । सनी अगरेज- की भाषा 1 अंगलेट-पु० शरीरका गठन या ढॉचा । अँगवना- सण क्रि० अगीकभर करना; सहना-बल कुक्िमि अमि अगवनिहारे, त रतिनाथ सुमन क्षर मारे'- रामा० । अपने सिर पर लेना । अंगवारा' -पु० खेतकी जोनाईमे पारस्परिक सददायना, गॉविके छोटे हिस्सेका मालिक 1 अंगांगिभाव पु सि०] अग अर अगीका सबंध; परस्पर अग ओर देद्, गौण और मुख्य, उपकारक और उपकार्यका सेध । अंगा -पु* अगरला । अंगाकडढ़ी -खी वादी, लिट्टी (जो अगारोपर सेककर बनायी जाती हैं ! अंगाधिष, अंगधीह- पुण [मं०] र्का स्वामी अहः राजा कर्ण 1 अंगार -पु° [०] अगारा, दहकता हुआ कोयला या काषटखंड; कोयला; मंगर मह; हितावली नामका पौषाएक राजा; लाल रंग । वि० लान । तूरारी- (रिन्‌) - पु ०विक्रीके लिए कोयला तैयार करनेवाला । -कुछक -पु० हितावली नामक पौधा । -धानिका,- शानी;- पाती,” शकटी स्त्री अँगीठी । “-परिपाचित- वि अंगारेपर पकाया




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