इब्नबतूता की भारतयात्रा | Ebnabatuta Ki Bharat Yatara

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Ebabtutaki Bhart Yatara  by मदनगोपाल - Madangopalमुकुन्दीलाल श्रीवास्तव - Mukundilal Srivastava

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मुकुन्दीलाल श्रीवास्तव - Mukundilal Srivastava

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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নু महात्मा शैल्लडल मुरशिदी के दर्शन करने पर इसके विचार सर्वथा पलट गये । प्रथम साथुने तो इससे भविष्य द्वाणी की थी कि तू बहुत लंबी यात्र। करेगा और मेरे भाईसे चोनर्मे तेरी मुलाकात भी होगी। दूलरेने इसको एक खप्नका आशय सम काते हुए यह कहा था कि मक्काको यात्राके उप- रांत यमन', ईराक ओर तुकोंके देशमे होता हुआ तू भारत पहुँचेगा और वहॉपर बनमें संकट पड़ने पर मेरा भाई दिल- शाद तेरी सहायता कर सब दुःख दूर करेगा। संतोंकी बाणीने बतूतापर ऐला जादुकासा प्रभाव डाला कि भ्रमण करनेकी खुप आकांज्षाएँ उत्तके हृरयमें सहस। प्रवुद्ध होगयीं और यदा करा विपकत्ति आ पड़ने, तथा अन्य साधु-महात्मा श्रौ- के दशन करने पर संलारते विरक्ति उत्पन्न होने पर भी वह सदैव उत्तरोत्तर बहती ही गयो । शेखोसे विदा होकर बतूना हजकी सीधी राह छोड़ काहिरा की ओर चल दिया और (१) नगरोंडी मात्रा तुल्य यह अस्यत प्राचीन नगरी संख प्रसिद्ध फेर ओह (फ़ााऊन) उपाधिधारी सम्राटोंको राजघानी थी। इसके अप्तंस्ष सुंदर भवन, तथा द्वाट-बाटक़ों देखकर बतूता आश्चय चक्रित हो गया । कते हैं কিননুরাক্ক সনতাউট অন অক ঘজাভাঁলি জরা पर पानी छादनेवाले सकक्‍्का लगभग बारद् हजार थे, गदहे तथा खबरवाछे मजदूर ३० इजारकी संल्या्ें थे और सन्नाट्‌ तथा उसकी प्रजाकी ३६००० नावों द्वारा नोछ नदीमें व्यापार हाता था। प।ठछों छो इस जगह - की जनसंख्याका इन बातोंसे अवश्य ही ठ नामाप हो जायगा। वास्तवमें यह नगर तब अत्यंत ही समृद्धिशाली था। इटछीके यात्री फ्रेस्कोव/ल्डीके कथनानुसार, जो १३८४ में यहाँ भाया था, महामारी फैलनेके उपरांत भी छगभग एक राख व्यक्ति नगरमें भोतर गुंजाइश न होनेसे राजिको नगरके बाहर सोते थे। बतुत्राके समप्र्तें यशॉॉयर डउमरको




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