विज्ञान के पथ पर | Vigyan Ke Path Par
श्रेणी : विज्ञान / Science

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
3 MB
कुल पष्ठ :
210
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No Information available about पुरुषोत्तमदास स्वामी - Purushottamdas Swami
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)विज्ञान के पथ परखेद प्रकाश किया कि विश्व की उतत्ति के समय उस
की सम्मति नहीं ली. गई । कोपरनिकस ने अपनी
पुस्तक 09 रिश्ए्णाप्मापएपड 0एछाप्रप (गल्ञपपरफ
भे यद् लिखा है फि सूय के चारो श्चोरप्रथ्यी यश्छन्य
अह घूमते हैं । पर यदद पुस्तक सन् १५४३ मे प्रका
भित हुदै जय कोपर निकुख सत्यु शव्या ण्र था । कददों
जावा हैं वि. सत्तरद साल तक उसने इस पुस्तक का
प्रकाशन राक रखा एक घुद्धिमान आदमी की तरद्
उसने श्रपनी यह पुस्तक पोप फो समर्पित कौ । चूकरि
इस पुस्तक को कोापरनिक्स मरने से प्ले फेयल हाथ
में वी ले सका था इसलिण यद् यद् मालूम न कर सका
कि उस में पक भूमिका जोड़ दी गई है जिसमें पाठकों
को सावधान किया गया है कि पुम्तक में जो छुछ लिस्श
गया है पद कपोलकल्पित है । कोपरनिफस का प्रिय
शिध्य प्रनो भा । बद चाहता थ। कि कोपरनिक्स के
सिद्धातों का खूब प्रचार हो जिससे उसके शर्द्व की
श्रात्मा फो शाति मिले । इम लिए उसने सम से यह
कदा कि प्रथ्वी सूये फे चायं ओर घुमती है और टॉस्सी
ने जो इुछ िग्या हैं बदद गलत है । इस से लोग नाराज हो
उठे । रोम से वेनिस को यह समाचार भेजा गया कि
जनों पोय के सुपुरे फर दिया जाय जिससे उस पर सुक
दमा चलायां जा स्के । उस यक्त बेनिस सोम से यिलकुल
स्वतन्द्र धा फिर मी स्मके शासको ने उसे रोम मेज दिया
यष वेनिस मे लिण्ष्क लला की याव है । ननो परक
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