अमितगति-श्रावकाचार | Amit Gati Shrwakachar

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Amit Gati Shrwakachar by भागचंद - Bhagchand

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भ्रथम परिच्छेद । [३ करिये दै । तां जो ह्ञानकी मन्दतार्ते हीनाधिक अर्य हेय ताको विशोषज्ञानी घुधार छोभ्यो, मोको मेदबुद्धि जानि कास्य मति कीज्यो, यह विशेषज्ञानीनतें मेरी परोक्ष प्रार्थना है । उपजातिछन्द । नापाकृतानि प्रभवंति भूयस्तमांति यैदृष्टिइराणि पथ: । ते शाखतीमस्तमयानभिज्ञा, जिनेंदवो वो वितरंतु लक्ष्मीमू ॥ १ ॥ झथे--ते श्रीजिनरूप चन्द्रमा तुम्दारे शास्वती जो म्षर्क्ष्मी ताहि विस्तारइ । कैसे हैं जिनचन्द्र अस्त किये हैं अज्ञानी परवादी जिननें । बहुरि जिनकरि शीघ्र ही दूरि किये सम्पक्दष्टिके हरणेवाले मोह अन्घकार ते फेर न होय हैं ॥ १ ॥ विभिध कर्मा्टकश्चुंखरं चे, गुणाष्टकेश्च्षुपेत्य पूतम्‌ । प्राप्ता्िकोकाप्रशिखामणिखं, मवतु सिद्धा मम सिद्धये ते ॥ २॥ अर्थ--ते श्री भगवान मेरे सिद्धिके अथं होऊ! जे रिद भगवान ज्ञानावरणादि अष्टकरमरूप सोकठ्कूं छेदि करि अर सम्यकतवादि अष्ट गुणरूप पवित्र रेश्चयैको प्राप्त होय तीन टोकके चूडामणिपने्कौ प्राप्त भये हैं ॥ २ ॥ ये चारयन्ते चरितं विचित्र, स्वयं चरन्ते जनमचनीयाः । आचार्या विचरन्तु ते मे, प्रमोदमाने हृदयारविदे ॥ २ ॥ अर्थ--ते आचार्यब्य किये आच।यनिविवै प्रधान आचार्यं आनेदका देनेवाला जो मेश हृदयकमल ता बिषें विचरहू । केसे हैं आचायै, जे नानाप्रकार चारित्रक आचरन करते सन्ते लोकर्को आचरन करे ह याते पूजनीक हैं । भावाथ--बीतरागरूप धर्मकों आचरण करं हँ अर दयाल होय ओरनिरको आचरन कर्यै है वेद्यै बीतराग भावनिके -वांछकनि करि




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