प्रधानाचार्य श्री सोहनलाल जी एक आदर्श जीवन चरित्र | Pradhanacharya Shri Sohanlal Ji Ek Aadarsh Jeevan Charitra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(च) प्राना इतोतिर्ञानादिकडुपदिषटवान्‌ । तचथा--ऋषमवद्र माना- दिरिति'। इस प्रमाण में वेघम्य का उदाइरण-- जो सर्व या श्राप्व होता है षह ज्योतिर्शान झाद़ि का उपदेश देता है । सेसे- जेन ऋषभ श्रौर वद्ध॑मान भादि । इसके पश्चात्‌ इसी ग्रन्थ मे प्रष्ठ १२८ (संस्कृत) तथा पृष्ठ ३३ ( भाषा ) में कहा गया दै-- अव्रवेधर््पोदाहरणम्‌-यो बीतरामो न तस्य परपरहा- ग्रहो । यथा-कषमदिरिति । छऋषभादेरीतरागत्वर्पा ग्रह- योगयोः साष्यसाधनधर्मयोः संदिग्धो व्यतिरेकः । इसमें वैधम्योदाहरण-- जो वीतराग होता है उसके परिग्रह घनौर ध्ाप्रहे नदी होता । जेते- ऋषम शाद्‌ । ऋषभ भादि के साध्य धमं श्रवीतरागस्व भोर साधन घर्मं परिग्रह और भ्राप्रहके योग में भ्यतिरेक संदिग्ध है। न्याय बिन्दु की उपरोक्त पंक्तियों से यह प्रकट है कि यदि श्रावायं धमेकीतिं जैन धमे का श्रादि उपदेष्टा भगवान्‌ महावीर को मानते तो वह उनके पूवं ऋषभ देव का नाम न रखते । इतना ही नहीं, दूसरे उदाहरण में तो वह भगवान्‌ महावीर के नाम को भी उड़ा कर यह प्रकट करते हैं कि उनकी दृष्टि में जैन धमं के झादि उपदेष्टा भगवान्‌ ऋषभ देव ही हैं । यां यह वाव ध्यान रखने की है इस उदाइरण से धर्मकीर्ति जैन तीयकरों के स्वज्ञ ,होने में सन्देह प्रकट करते है । वरह रनकी संवज्ञता का पूर्ण निषेध नहीं करते ।




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