जैन साहित्य का बृहद इतिहास भाग - 1 | jain Sahity Ka Brihad Itihas Bhag - 1

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
11 MB
कुल पष्ठ :
374
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)( १६ )भता सुतंस्कृत है। बेद के इस्द्ादि देवों का रूप झऔर जनों के माध्य का
स्वस्य केषा जॉय तो वैदिक देव सामान्य मानव से श्रघिक शक्तिदाली हैं किन्तु
ढृलियों की हृष्टि से हीन हो हैं । मानवसुनभ' क्रोध, राग, टेप भावि वृत्तये क्ष
वैकि देवों में साप्नाज्य है तो जैनो के श्राराध्य मे इन वृत्तयो का श्रमाबही है ।
वैदिको कः इन देवो की पूज्यता कोई माध्यात्मक सक्ति के कारण नह किन्तु नाना
प्रकार से श्रनुगरहं मौर निग्रह रक्तिं के कारण है जव कि जैनोके श्राराध्य ऐसीकोई शक्ति के कारण पूज्य नहीं किस्तु वीतरागता के कारण श्राराष्य हैं ।
ज्ञाराधक में वीतराग के प्रति जो भ्रादर है वह उसे उनकी पूजा में प्रेरित करता
है जब कि वैदिक देव का डर श्राराधक के यज्ञ का कारण है । बैदिकों ने भूदेवीं
की कर्पना तो की किस्तु वे कातकरम से स्वार्थी हो गये थे । उनकों अपनी पुरोहिंताई
की' रक्षी' करनी थी । किन्तु जैनों के भूदेव वीतराग मानव के रूप में
कल्पित हैं। उन्हें यज्ादि करके कमाई का कोई साधन जुटाना नहीं था ।
घोर्मिक क्मफाड में वैदिक. मे यज्ञ मूल्य था जो अधिकांश बिना हिसा या पयु-वध
के पूणं नहीं होता था जब कि जैनधर्म में क्रियाकांड तपस्यारूप है--अनशन ध्रौर
ध्यानरूप है जिसमें हिगा का नाम नहीं है। ये वैदिक य देवों को भ्न करने
के लिए किये जाते थे जब कि जैन में श्रपनी झात्मा के उत्कष के लिए ही धार्मिक
झमुष्ठान होते थे । उसमें किसी देव को प्रतन्न करने की बात का कोई स्थान नहीं
था। उनके देव तो वीतराग होते थे जो. प्रसन्न भी नहीं होते श्रौर श्रप्रसन
भी नहीं होते ।. वे तो केवल श्रनुकरगीय के रूप में श्राराध्य थे ।वैदिको ने नाना प्रकार के इन्द्रादि देवों कौ कल्पना कर री थी जो तीनों
लोक में थे और उनका वर्ग मनुष्य वर्ग स भिन्न था श्रौर मनुष्य के लिप श्राराध्य
था। किस्तु जैनो ने जो एक वर्ग के रूप में देवों की कल्पना की है वे मानव,
वर्ग से प्रथग्वर्ग होते हुए भी उनका वह वर्ग सब मनुष्यों के लिए श्राराध्य कोर्ट में
नहीं हैं। मनुष्य देव की पूजा भोतिक उन्नति के लिए भलें करे किन्तु श्रात्मिक
उक्षति क लिए तो उससे कोई लाम नहीं ऐसा मस्तव्य जैनघर्म का है। श्तएव
एते ही वीतराग मनुष्यो कौ कत्पना जैनधमं ने कों जो देवों के मी श्राराष्य हैं ।
देव भी उस मनुष्य की सेवा करते है) सारांश यहहै किदेव की तहं भिन्तु
मानव की प्रतिष्ठा बढाने मे जैनधमं अग्रसर है ।देव था ईश्वर इस विश्व का निर्माता या. नियंता है, ऐसी कल्पना दैदिंकों की
देखो जाती है । उसके रथान में जैनों का. सिद्धान्त है कि सुष्टि तो भ्रनादि काल
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