जिनांगमकथासंग्रह | 1802 Jinagamkathasangrha;

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1802 Jinagamkathasangrha; by बेचरदास दोशी- Bechardas Doshi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[१३ ] (३२) रकारान्त स्लीलिंग शब्दोंके अत्य 'र! कोराहोता है । उदा० गिर्‌-गिरा (१८) सयुक्त व्यजनम पहेंे आये हुए कु, गु, दू, डू, त्‌ दूं, प, थे, छु, जिह॒वामूलीय (%) ओर उपष्मानीयका (2 ) प्राइतमें लोप हो जाता है ओर बचा हुआ व्यजन यदि शब्दके आदिमिं न हो तो उसकी द्विरक्ति हो जाती है। और वादे नियम ८ के अनुसार उसमे परिवतन होता है । उदा० भुक्त-भुत्त, दुग्ध-दुद्ध, पटपद-छप्पम, तिश्वक-विश्वल, हु४-तुद्र, निध्ृह-त्रिषपह, स्तव-तव 1 (१९) संयुक्त व्यजनमें पीछे आये हुए मूं, न, और यू का लोप हो जाता है। आर शेप बचा हुआ व्यंजन यदि शब्दकी आदिमें न हो तो द्विदक्तिको पाता है । उदा० य्रुग्म- शुग्ग, । नग्न-नग्ग, इयामा-सामा | (०) संयुक्त अक्षरमें पहेंले या पीछे रहे हुए छू, व्‌, बु, ओर र्‌ का लोप हो जाता है। ओर शेप वचा हुआ व्यंजन ५




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