अध्यात्म कमल मार्तण्ड | Adhyatma Kamal Martand

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Adhyatma Kamal Martand  by कवि राजमल - Kavi Rajmal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२२ अध्यात्म कमल मातंणड लारीसदिता ) का यथेष्ट परिचिय मी मिल जायगा; जिसको देना भी यदय द दै :-- (९) पंचाध्यायीमे, सक्यक्त्यमे प्रशम खवेगादि चार गुणका कथन कसते हए, नीचे लिपी एक गाया अरन्यकार द्वारा उद्धत पाई जाती हैः-- सवेश्नो शिव्येश्ो शिदण गरहा य उवसमो भक्ती । चच्छल्ल अणुकंपा रगुण हति सम्भत्ते ॥ यह गाथा, जिसमे सम्यकत्यवे स्वेगादरिक ग्र्गुणोका उल्लेख दै, यमुनन्दिभावकाचारमे सम्यक्त्व प्रकरणकी गाथा है--पहाँ मूलरूपसे न० ४६ पर दुर्ज है-्रीर दस श्रावकाचारवे क्तं त्राचायं वसुनन्दी गिक कौ १२ शताब्दी श्रन्तिम मागमे हए हे। एसी हालतमे यस्य है कि पचाध्यायी पिक्रिमकी १रबीं शतान्दीसे वादकी यनी हई है, ग्रौर इसनिए यह उन श्मृतचन््राचा्ैकी कति नी दो सकती जो कि बमुनन्दीसे नहुत पहले हो गये ह । श्रमृतचद््ाचायैरे पुरपार्थमिद्ध्‌ धाय अन्या तो श्येनगिन सुदरष्टि+ नामका एक पत्र भी इस अन्यमें उद्धृत है, जिसे अन्थकारने यपने कपनकी प्रमाणुतामे “उक्त च” रूपसे दिया दे श्रौर इससे भी यद बात श्रीर व्यादा पृष्ट दती टै कि ग्रस्त प्रन्थ श्रमूतचनद्राचा्का चनाया हुमा नदी दे। यरं परभ इतना श्रीर मी प्रकट कर देना चाहता हूँ कि प० मक्सनलालजी शास्नीने श्रपनी भाषा टीकामें उक्त गायाको “लेपक' बत- साया है श्रीर उसके लिये कोई हेतु या प्रमाण नदीं दिया, मि फटने इतना दो लिस दिया है फि”यद गाद्ा पचाध्यायीमं चपक रूपसे श्राई है।” इस फुडनोटकों देखकर बड़ा दो खेद होता है श्रीर समभ नहीं श्राता कि उने इख लिपनेगा क्या रदस्य है ॥ यड्‌ गया पंचाध्यायीमे क्रिसी तर्द पर भी हेपक--्रादको मिला दृई-नदो शे सक्ती; क्योंकि ग्रन्थकारने श्मगले दी पयमे उषे उदधरणको स्वय स्वीकार तथा घोषित किया है, श्रोर वद प इष प्रकर ई--




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