मानस माधुरी | Manas Madhuri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ ७ प्रौर पंच तत्वों का धर्म परिवतंन कर देने शक्ति का प्रदशंन--विषाह का धैमव--देवो के प्रति कृपा योक दानवो वृत्ति प्रवाञ्छनीय--उनकी निहूँदुकी कृपा फा सूर्यप्रमा की माति सम विषम विहार । १२- राम का धाम धाम फा प्रथ--रूप के भिन्न-भिन्न ध्यान तदनुकूल भिन्न-भिन्न घाम, निराकार रूप का घाम सम्पूर्ण विश्व--सस्त हृदय तीथंस्थल, विभुतिमत्‌ श्रीमद्‌ ऊर्जित पदार्थ, उसके विशिष्ट घाम हैं--सुराकार रूप के धाम हैं क्षीरसागर, घकुष्ठ, नित्य साकेत, जिनका विशद वर्णन मानस में किया ही नहीं गया । इस रूप का विशिष्ट घाम होना चाहिये भक्तो का मानस--नराकार रूप का धाम है सम्पूण भारत--विशेषतः चित्रकूट श्रौर शभ्रयोध्या, जो “सुराज्य” श्रौर रामराज्य'' के प्रतीक ई--जहां सुराज्यया रामराज्य होगा वही राम का धाम होगा-सहयोगौ जीवन ही राम का धाम है--प्रयोष्या फी नगरनिमणि न्वस्या एव वहां के राजा प्रजा का कर्मठ सात्विक जीवन । उत्तरार्धं १२३- लक्ष्मण श्रौर भरत मीनघर्मी सयोगी सक्त लकमण श्रौर चातकधर्मी वियोगी भक्त मरते-राम श्रलचंय € प्रतएव उनके सा्निघ्य के लिए लद्मण सा भाग्य सब का नहीं किन्तु रामराज्य का सुनीम होना सम्भव है श्रतएव भरत ही भक्त के प्रकृत श्राददी हैं--विरह धर प्रन्यासौ भाव-दिल भ्रौर दिमाग का सन्तुलन--भक्ति मक्त भगवन्त ग्रु लदपण की उग्र प्रकृति--राम के प्रति परम श्रद्धा ही के कारण वैसा स्वमाव--राम का व्यक्तित्त उनके श्रादेश से भी श्रघिक प्रिय--भरत का सौम्यत्व सुप्रीव श्रौर विभीपरण का विपयंय--कर स्वामिहित सेवक सोई शट्माप्रो तथा लोभ क्रोघ काम की विपम परिस्थितियाँ--तदीयता की पराकाएा । चिन्नकूट सभा का विवेक--लदमण श्रोर भरत के प्रश्न । दोनो के एक टूसरे से प्रश्न । दोनो के एक दुसरे के प्रति उद्गार । १४-सद्गुर शर दो नावधाराएं प्रतएव दो प्रकार कै श्राराघ्य । एक श्रोर है निवृत्ति, कमं सन्यास, शान, शान्ति, व्यक्तित्व की निन्दता, ऊजस्विता, कृति का प्रभाव--टूसरी शोर हे प्रवृत्ति, कर्मयोग, भक्ति, श्रानन्द सामाजिक सुव्यवस्था, परम सदयं, वस्तु फा प्रमाव 1 श्रग्नि उपासना का विकसित सूप धिव पूना प्रोर सूयं उपासना का विकसित रूप विष्णु पूजा । प्रतीक पूजा--विश्वत्मा झीर




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