निशीथ - सूत्रम भाग -4 | Nishith Sutram Bhag - 4

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
श्रेणी :
Nishith Sutram Bhag - 4 by मुनिश्री कन्हैयालालजी कमल - Munishri Kanhaiyalalji kamal

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about मुनिश्री कन्हैयालालजी कमल - Munishri Kanhaiyalalji kamal

Add Infomation AboutMunishri Kanhaiyalalji kamal

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
माष्यगाथा ५११८-५१२७ ] पीडश उददेशक' ७ उडियपरिग्गहिते एते चेव तिणि पच्छित्ता काललहृश्रा तवगरुशग्रा । जम्हा जहण्णादिविभागेण कत सण्णिहितासण्णिहितेण ण विपेसियन्व, तम्हा विभागे श्रोहो गगरो ।५१२९१॥ इदाणि विभागपच्छित्त ~ तत्य एयाणि चेव जहण्णमज्मिमुक्कोसागि असण्गिद्यिसण्गिहिय भिण्णा खद्राणा भवति । तहे मण्णति - चत्तारि य उग्वाया, पमे चितियम्मि ते अणुग्धाया | ततियम्मि य एमेवा, चरत्थे छम्मास उग्धाता ॥५१२२॥ जहण्णेण श्रसणििहिय पढमं ठाण, सण्णिहिय वित्तिय ठाण | मज्मिमे श्रसण्णिहिय तइयदाणं, सण्णिहिय चउत्य | उक्कोसेण श्रसण्िहिय पचम, सण्णिहिय छु । जहण्णए श्रसण्णिहिए पायावच्चपरिग्गहिते ठति चउलहुय, सण्णिदिष चउगरुर । मज्िमए अ्रसण्णिहिए “एमेव” त्ति - चउग्रुरुगा, सण्गिहिए छल्लहुगा।1५१२२॥॥। पंचमगम्मि वि एवं, छं छम्मास होंत5णुग्घाया । असनिहिते सब्निहिते, एस विही ठायमाणस्स ॥५१२३॥ उक्कोसए्‌ अ्रसण्णिहिए पायावच्चपरिगहिते ठति एमेव त्ति छललहुगा, सण्णिहिए छग्गुरू । एसो ठाणपच्छितस्स विधी भणितों ॥1५१२३॥। पायावच्चपरिग्गह, दोहि वि लहु होंति एते पच्छित्ता | कालगुरु कोडंबे, डंडियपारिग्गहे तवसा ॥५४१२४॥ पायावच्चे उभयलहू, कोटुविए कालगुरू , उडिए तवग्रुरू । सेस पूरवेवत्‌ ॥५१२४॥ राणपच्छित्त चेव वितियादेसतो भण्णति - अहवा भिक्‍्खुस्सेयं, जहण्णगाइम्मि ठाणपच्छित्त | गणिणो उवरि छेदो, मूलायरिए हसति देडा ॥४१२५॥ ज एय जहण्णगादी श्रसत्निहियसन्निहियमेदेण चउलहुगादि - छंग्गुरयावसाण एय भिक्‍खुत्स भणिय । “पणि” त्ति-उवल्ाश्रो, तस्र चडउग्रुरुगादी चेदे ठ।यति । श्रायरियस्स चंल्लहुगादी मूले ठायति । इह्‌ चारगाविकष्पे जहा उवरिपद वति तहा हेडापद हस्सति । ।।५६२५॥ पठमिल्लुगम्मि ठाणे, दोहि वि लहुगा तबेण कालेणं | वितियम्मि य कालगुरू, तवगुरुगा होंति तश्यम्मि ॥|११२६॥ इह पढमिल्लुग पागतित ठाण, वितिय कोटुब, ततित दडिय | सेस पृव॑ंक्‍त्‌ ॥५६२६॥ एये ठायतस्स पच्छित्त भणिय। इृदाणि पडिसेवतस्स पच्छित्त भण्णति - चत्तारि छच लह गुरु, छम्मासिय छेद लहुग गुरुगो तु । मूल जहण्णगम्मी, सेवंते पसज्ज्ण मोत्तुं ॥४१२७॥




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now