रायचन्द्र जैन शास्त्रमाला | Raichandra Jain Shastramala Ac 2113

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
5 MB
कुल पष्ठ :
104
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)१०नतासे है । तृतीय श्यादस्वि नास्ति च धटः” भज्गमे करमसे योजित सत्त्व असत्त्वकी
प्रषानतासे प्रतीति है। क्योंकि किसी अपेक्षा घटका अस्तित्व और किसी अपेक्षासे नासि-
त्वका मी अनुभव होता है। तथा चतु्थमें अवक्तव्यत्वकी, पश्चम सत्तासहित अवक्तव्यत्वकी,
पष्ठमे असत्तासहिंत अवक्तव्यत्वकी, ओर सप्तमभज्ञ्मँ क्रमसे योजित सत्ता तथा असक्ता-
सहित अवक्तम्यत्वकी प्रधानतासे भ्रेतीति होती है, इस प्रकार सप्तमझ्लोंका विवेक जानना
चाहिये । प्रथम भक्गसे “स्थादस्त्येव घटः” आदिसे लेके कटै भज्गोमे जो असत्व आदिका
भान होता दै उनकी गौणता है न कि निषेध. क्योकि जब कथचित् घटकी सत्ता है ऐसा
कहा गया तब कथचित् असत्ताका भी भान होता है । परन्तु असत्ताकी गोणैता भर स-
त्ताकी प्रधानता है ऐसे ही आगेके भर्गोंमें भी जिस धमेको कहें, उसकी प्रधानता और उससे
विरुद्धकी गौणता समझनी योग्य है ॥ननु--अवक्तव्यत्व॑ यदि धमान्तरं तहि वक्तव्यत्वमपि धमोन्तरं प्राप्रोति, कथं सप्रविध एव
धम ? तथाचाष्टमस्य वक्तव्यत्वधरमेस्य सद्भावेन तेन सदाष्टभङ्की स्यात्, न सप्तभङ्गी,
इति चेन्न ।शकाः-जैसे अवक्तव्यत्वके साथ योजित असित्व नालित्व धर्मोको कथन करनेमे
स्था अशक्यत्वरूपता है रेसेही वक्तव्यत्वभी धमातर हो सकता है तो इस रीतिमे अ-
চল वक्तव्यत्वरूप धर्मके होनेसे अष्टभंगी नय कहना उचित है नकि सप्तभगी ? ऐसी शंका
नहीं हो सकती ॥सामान्येन वक्तज्यत्वस्यातिरिक्तस्याभावात् । सत्त्वादिरूपेण वक्तव्यत्व॑ तु प्रथमभड़ादावे-
वान्तभूतम्। अस्तु वा वक्तव्यत्वं नाम कश्वन धर्मोडतिरिक्त , तथापि वक्तव्यत्वावक्तव्यत्वाभ्यां
विधिप्रतिषेधकस्पनाविषयाभ्यां सत्त्वासत्तवाभ्यामिव सप्तभङ्खयन्तरमेव प्राप्नोतीति न सत्त्वा-सक्त्वप्रमुखसप्तविधधमंव्याघात' । तथा च धर्माणा सप्तविधत्वात्तद्गिषयसंशयादीनामपि सप्त,
विधत्वमिति सप्रभज्ञया अधिकसंख्याव्यवच्छेदस्सिद्ध ।क्योंकि सामान्यरूपसे वक्तव्यत्व भिन्न धर्म नहीं है ओर सत्त्व आदिरूपसे वक्तव्यत्व
रथम भङ्गादिमे अन्तत है ओर वक्तव्यत्वभी कोह प्रथक् धर्म मानो तोभी सक्ततअस-
त्वक समान विपि प्रतिषेध कस्पनाको विषय करनेवाले वक्तव्यत्व तथा अवक्तव्यत्व धर्मोसे
अन्य सप्तभड़ी ही सिद्ध होगी । इस रीतीसे सत्त्व अस्व आदि सप्त प्रकारके धम॑का
व्याघात नहीं हुआ । इससे यह सिद्धान्त हुआ की धर्मेके सात भेद होनेसे उनके विष-
यभूत संशय जिज्ञासा तथा अश्वादिकभी सेप्तमेद्सहित है इस कारणसे सप्तभज्ीकी
अधिक संख्याका निराकरण हुआ ॥नन्वेवं रीत्याऽधिकसख्यान्यवच्छेदेऽपि न्यूनसंख्याव्यवच्छेद कथ सिद्धयति ? तथाहि -१ कथचित् नहीं हे २ सत्ता ३ असत्ता ४ अनुभव, ५ कथचित् घट है ६ असत्ता ७ अप्रधानता
नकि निषेध ८ स्यादस्त्येवे ९ सात प्रकारके
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