सत्य सगड़ीत | Satya Sagdhit

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : सत्य सगड़ीत - Satya Sagdhit

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about दरबारीलाल सत्यभक्त - Darbarilal Satyabhakt

Add Infomation AboutDarbarilal Satyabhakt

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
तेरा प्यार [५ मेने चाहा तेय प्यार छल करनेमे छल्य गया में बनकर मूखे ममार । मेन । समझा था तुन्नका छल्ता हैं अब समझा में ही जलता हूँ नुझकी धोखा देना ही था धोख् खाना आप) जब समझा ठ मन मे बेठा देख रहा सब पाप ॥ मेरा चर हुआ अभिमान तेरी देग्व पडी मुसकान नर चरणो पर बरसनि ल्गा अश्र की बार | मेन चाहा तेरा प्यार ॥ २ ॥ मन चाहा तरा प्यार लेग आशाबाद मिला तब सूझ पडा ससार ॥ मेन । जाति पाँति का मोह छोड कर ऊँच नीच का भेद तोड कर आया तेरे पास, दिखाया तने अपना ठांट सर्वधर्म सम- भाव, अहिंसा का सिखलाया पाठ मैन पाया सल्न-समाज जिसम था तेरा ही साज हुआ विश्वमय, विश्ववन्घु मैं तरा ग्विदमतगार मेन चाहा तग प्यार | ০০৫০৯ ২০০৫ ২১১




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now