सत्यामृत आचार कांड | Satyamrit Aachar Kand

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रवृत्ति को भी स्थान है। हो, वह ग्रवालि पाप या अशुद्ध पुण्य न होता चाहिये | रद चर के भीतर उसी अबत्ते का समावेश हैं| सकता है লী হুল पृण्यरूप ह। । प्रवृत्ति के रूप इतन भिन्न मिन्न हैं कं इतन से ही उत्त पूरी ताह समझ लेना कठिन है | एक प्रवंचि जो एक লক্ষে ত शुद्ध मादरम होती ह दूसरी तरफ से अशुद्ध हो सकता है एक आदर्मी ने धनशाढर। बनवराई और उसके नियम भी खूब उदार रकखे जिससे वह शुद्ध प्रवृति कहलाते पर यह सब काम उसने सिप इसलिये बकिया जिससे उसका यश हो ओर्‌ पत्ती सेठ का, जिपने छोटी घ+शाल्ा রলনাই ই, নীল্লা देखना पड़े, ऐसी भावना के साथ उदार से उदार नियमवाी घमशारा मी पृण्य नहीं कला सकती क्यांकि एसा यमोलालप व्यक्ति यज्ञ की वदीपर जनहित का भी बलिदान कम्ता है, इसके लिये वह पाप से भी सम्पत्ति पैदा करता है, यश न मिले तो वद्द विश्वासबात भी करता है, दूसरें। का अपन भी करतः हू इस प्रकार वेश्रकन्यण की जनह विश्व का अकल्याण अधिक कर जाता है, कल्याण की उसे पवाह नहीं होती । इत्त प्रकार झुद्ध(ण्य रूप दिखनवार्ली प्रवृत्ति केसी अशुद्व॒पुण्य यानष्टपुण्य होती है यह भी समझ लेना चाहिये | इसके लिये प्रवृति के भद कु विशेष रूपमें बतलाना पड़ेंगे । रत्ति दस तरह की होती दं प्रचचि के दस भेद १ मूठ प्रनृत्ति, २ उरण प्रवृत्ति, ३ गच्छ -पृष्य प्रवृत्ति ४ सुक्तपण्यप्रवृत्ति ५ नृ्ठपुण्य प्रवृत्ति ६ अजातपुण्य प्रवृत्ति ७ দান সবজি, £ অস্তন্ पुण्य प्रवृत्ति ९ पुण्थःशपपि प्रवृत्ति, १० इद्ध पुण्य प्रवृति | भगवती अहिंसा हैं सेल तारा जौ प्रवृत्ति है ब्रह सु দি | है चलना, उठन।, बैठना, आदि मूल प्रवत्तियाँ हैं इन्नो पुण्य कह सकते है न प्राप | इन प्रवृत्तियों के लिये जो दूसरी ग्रत्रत्तियां की जातीं हैं वे पुण्य या पाप रूप हो जाती हैं. जैसे भोजन करना न पुण्य है न पाप, परन्तु भोजन के लिये जबरदस्त करना, दूसरे को सतारा पाप है। मत- ट्व यह्‌ कि मूल प्रतृत्तिया के आधरार्‌ म पृण्यप्राप खड़े होते हैं वे छथे न॒पृण्परूप हैं न पापरूप £, इने सदाचार को धकर) नशी लगना हन्द सत्र कईं कर सकता ई । २ उरण प्रवृश्धि -४न पैसा या सेत्रा भादि का ऋण चकाना | इस प्रवृत्ति के करने में पुण्य नहीं है पर न करने में पाप अब्श्य है इसलिये जिसके सामने इसका अवसर अबि उसे अदय यह करना चाहिये। सदाचारी और योगी के लिये भी यह कनव्य है। एक आदमी अपने शरीर पोषण के लिय समाज से लेता है पर उसके बदले में समाज सुखके लिये आवश्यक कुछ देता नहीं है इस प्रकार अगर वह उरण नही होता तो पाप करता है | अपने उपकारी का आदर सेत्रा बिनय आदि करना भी उरण प्रवृत्ति है । ३ गच्छन्पृण्य प्रवृत्ति-अपने प्रण्य का फल भोगना । इसने धि कौ या समाज को सेवा की उसने हमर। आदर सक-र किया यद गाया तो उतने अंश में हम पृण्ठ का फल भोग चुके | जितने अंश में हम आइर सत्कार आदि केंगे उतने अंश में हमारा पृण्य फल दता हुआ




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