स्मरण - यात्रा | Smaran Yatra

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Smaran Yatra by काका कालेलकर - Kaka Kalelkar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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९ हमारे देशमें जीवन-चरित्र लेखन बहुत कम पाया जाता है। हमारे लोग माहात्म्य लिखते हें, स्तोत्र लिखते हैँ, लेकिन जीवनियाँ नहीं लिख सकते। जहाँ दूसरोंकी जीवनियोंके बारेंमें असा अकाल हो, वहाँ आत्म- कथाकी तो बात ही क्या? तुकाराम महाराजने अपने बारेमे दसपच अभंग लिखनेमें भी कितनी अरुचि अवं संकोच प्रकट किया था पहले मुज्ञ अंसा लगा कि हम लोग जीवनियां लिखि ही नही सकते । लेकिन स्मरण-यात्रा ' के कुछ अध्याय पढ़कर कओ मित्रोंने अस पर जो आलोचना की, अुसे सुनकर यह्‌ बात मेरे ध्यानमे आ गयी कि आत्मकथा या आपबीती छिखना तो हमारी संस्कृति अवं समभ्यताको मंजूर ही नहीं । लाल्ची मनुष्यके हाथों आसानीसे . होनेवाे अनेक पापोकी परम्परा गिनाते हु बिलकुल हद या चरम सीमाके तौर पर भतंहरिने अपने अक इलोकमें ' निजगुणकथापातक * का ज़िक्र किया हें। आदमी अपनी आत्मकथा लिखे या न लिखे, जिसकी चर्चा करके गांधीजीने अपना फंसलादे ही दिया हं । मेरा अपना खयाल यह हं कि श्रेष्ठ अवं असाधारण विभूतियां ही नहीं, बल्कि अत्यंत साधारण, निविदेष, प्राकृत व्यक्ति भी अगर प्रांजलतासे, ख़ास शिष्टाचारोंकी पाबन्दियोंमें रहकर आत्मकथाओं लिखें तो वह अिष्ट ही होगा। हरेक मनुष्यके पास यदि कोओी सबसे क्रीमती चीज़ हो, तो वह अुसका अपना अनुभव ह| यदि कोओी सहूदयतापूवेकं अपना अनुभव हमे देना चाहता हं, तो हम क्यों न अुसका स्वागत करं? मतलबी प्रचारकों द्वारा लिखे गये अतिहास और जीवनियाँ पढ़नेकी अपेक्षा भेक सच्ची आत्मकथा पढ़नेसे हमें ज़्यादा बोध मिलता है। और यदि हमारी अभिरुचि कृत्रिम न बन गयी हो, तो किसी आपन्यासकी अपेक्षा असी आत्मकथामें हमें कम आनन्द नहीं मिलना चाहिये। लेकिन दुःखकी बात तो यह हें कि बहुतेरे लोग अपने




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