संचिता | Sanchita

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Sanchita by गोपाल शरण - Gopal Sharan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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संचिता है जग की तू अतुल सरलता, भामा अद्भुत - नामा। भव्य वाल-सहचरी प्रकृति की, है वामा अभिरामा। जग-नन्दन-वन की विदारिणो; मनेदहारिणी वाला । अन्धकारमय ग्राम-धाम का, तू रै विमल उजाला। शान्त-कान्त सुपमा-सागर के, वडवानल को उवाला) गुणगणवती ग्राम-देवो-सी, है मन्डल मणि-माला। अपनो मञ्जुल मृदुल गोद में, तुभे प्रकृति ने पाला। रन मं लोट-लोट कर तूने, पाया रूप -निराला। ९०




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