प्रमुख संस्कृत महाकाव्यों में पौराणिक संदर्भ एक आलोचनात्मक अध्ययन | Pramukh Sanskrit Mahakavy Men Pauradik Sandarbh Ek Alochanatmak Adhyayan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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19 <. शोध -प्रनन्धय के द्वितीय अध्याय में पुराणों पर गहन विचार-विमर्श किया गया हैं। इसके अन्तर्गत प॒र्णो का स्वरूप, अर्थः लक्षण, रचयिता, स्चनाकाल ओर भेदों की मीमांसा की गई है महापुराणों के सामान्य परिचय के साथ उपफ़राणों का नाम निरूपण किया गया हे। शोध-प्रबन्ध के तृतीय अध्याय में पुराणों के प्रतिपाद्य विषय प्र विशद विवेचन प्रस्तुत किया गया है। इसके अन्तर्गत त्रिदेव की पुरनतिष्ठा, व्रत एवं वर्णश्रम धर्म का प्रतिपादन, पौराणिक धर्म, अवतारवाद की अवधारणा, भविति “का स्वरूप, पुराण और राष्ट्रीयता, पुराणों में इतिहास, पुराणों में भूगोल, पुराणों में चिकित्सा, वेद से अधिक पुराणों की महनीयता, पुराणों मै वेदिक विचारों का समन्वय, वेद पुराण की एकता, प्रवृत्ति एव निवृत्ति का समन्वय, लोक कल्याण-पारिवारिक, सामाजिक एवं धार्मिक सन्दर्भ, विषय पर गम्भीर चिन्तन वर्णित है। शोध-प्रबन्ध के चतुर्थ अध्याय में संस्कृत के पाँच प्रमुख महाक्यों - कुमारसम्भव, रघुवेश, किराताजुनीय, शिशुपालवध तथा नैषधीय चरित, की विशद विवेचना की गयी हे, साथ ही उसके काव्य सौन्दर्य पर प्रकाश डला गया है। अन्ततः महाकाव्य भे उपलब्ध पौराणिक आख्यानों का नाम निरूपण किया गया हे। शोध -प्रबन्ध के पंचम अध्याय में प्रमुख पौराणिक आख्यानों का सांगोपांग वर्णन हे साथ ही महाकाव्य में उनकी समरूपता एवं भिन्नता को सोदाहरण दिखाया ग्या हे। मूल रूप में वे कहाँ से उद्धृत है इसका भी स्पष्ट साक्ष्य प्रस्तुत किया गया हे। शोध -प्रबन्ध के षष्ठ अध्याय म गौण पौराणिक आख्यानों की विशद चर्चा के साथ महाकाव्यों मै उनके उदाहरण भी वर्णित किये गये हैं। पौराणिक अध्यन, महाकाव्यों मे वर्णित आख्यान से यदि भिन्न है तो उसका भी निरूपण किया गया हे। इसी अध्याय म एक समीक्षात्मक मत भी प्रस्तुत किया गया हे।




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