जैन - सिद्धान्त - भास्कर | Jain Siddhant Bhasker

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Jain Siddhant Bhasker  by हीरालाल - Heralal
लेखक :
पुस्तक का साइज़ :
7 MB
कुल पृष्ठ :
142
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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किरण ४ ] भरवणएवेर्गोल एवं यहां की श्रीगोम्मट-मूति २११मराठी भाषाओं का उद्गम क्रमशः अद्ध मागधी ओर महाराष्री प्राकृत से हुआ प्रकट है और यह्‌ भी विदित है कि मराठी, कोङ्कणी एवं कन्नड भापाच्नं का शब्द-विनिमय पहले बराबर होता रहा है। क्योंकि इन भाषा-साषी देश के लोगों का पारस्परिक विशेष सम्बन्ध था। अब कोङ्कणी भाषा में एक शब्द 'गोमटों! या 'गोम्मटो! मिलता है और यह संसत के मन्मथः शब्द्‌ का ही रूपान्तर है। यह्‌ अद्यापि सुन्दर अर्थ मे ही व्यवहृत दहै) कोङ्कणी माषा का यह शब्द मराठी भापा में पहुँच कर कन्नड भाषा में प्रवेश कर गया हो--कोई आश्य नदीं । कुछ भी हो, यह स्पष्ट है कि गोम्मट संस्कृत के मन्‍्मथ शब्द का तद्धवरूप है ओर यह्‌ कामदेव का द्योतक है। श्रीयुत प्रो० के० जी० कुन्दनगार एम० ए० आदि एक दो विह्वान्‌ इससे सहमत नहीं हैं। बल्कि कुन्द्नगारजी का 'कणोटक-साहित्य-परिपत्पत्रिका भाग >०९ 1, पृष्ठ ३०४--३०५ में इसके सम्बन्ध मे एक लेख प्रकाशित भी हो चुका हैं। पर श्रीयुत गोविन्द पै अपने इसी मत को इसी किरण में अन्यत्र प्रकाशित अपने अंग्र जी लेख मे समर्थन करते हैं । श्रीयुत मित्रवर ए० एन० उपाध्ये और श्रीयुत के० जी० कुन्दनगार आदि विह्वानो को इस पर सम्रमाण विशेष प्रकाश डालना चाहिये। अव प्रसर हो सकता है कि बाहुबली की विशाल मूत्तिं मन्मथ या कामदेव क्‍यों कहलायी । जैनधमानुसार बाहुबली इस युग के प्रथम कामदेव माने गये है। इसी लिये श्रवणएवेरगोल मे या अन्यत्र स्थापित उनकी विशाल मूततियां उसके (मन्मथ के) तद्धवरूप गोम्मट' नाम से प्रख्यात हरं । बर्कि वाद्‌ मूतिस्थापना के इस पुण्यकाये की पवित्र स्ति को जीवित रखने के लिये आचाये श्रीनेमिचन्द्रजी ने इस मूत्ति के संस्थापक चाबुरुडराय का उल्लेख गोम्मटरायः के नाम से ही किया और इस नामको प्रख्याति देने के लिये दी चादुखडराय के लिये रचे गये अपने पच्वसंग्रह धर॑थ का नाम उन्दनि गोम्मटसारः रख दिया 1 जैनियों मे बाहुबली की मूत्ति की उपासना कैसे प्रचलित हुई यह सी एक प्रश्न उठ खड़ा होता है ! इसका प्रथम एवं प्रधान कारण यद्‌ है कि इस अचसर्पिणी-काल मे सव से प्रथम अथौत्‌ अपने श्रद्धेय पिता आदि तीथेङकर वषय स्वामी से भी पहले ोक्ञ जाने वाले क्षत्रिय वीर बाहुवली दी थे! मालूम होता है कि इस युग के आदि में स्वे-प्रथम मुक्ति-पथ-प्रदर्शक के नाति आपकी पूजा, प्रतिष्ठा आदि जेनियों मे सवेमान्य-रूम से प्रचलित हुदै । दूसरा कारण यह्‌ मी दो सकता है कि बाहुवली के अपू त्याग, अलौकिक आास्निग्रह्‌ शरोर नैजवन्युपेम श्यादि असाधारण एवं अमानुपिक शुण्णों ने सर्वेश्रथम अपने वढ़े भाई सम्राट्‌ भरत को इन्दे पूजने को बाध्य किया होगा, वाद भरत का ही अनुकरण आओरो ने भी |[क+ विशेष जिज्ञाछ भाल्कर साग ४, किरण २ में সহিত দীন্ুন লালিলু উ তা “পীর मूत्ति गोम्मट क्‍यों कहलाती है ९! शीर्षक लेख देखे ।




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