चन्द्रकान्त | Chandrakant

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Chandrakant by पंडित शिवनारायण - Pandit Shivnarayan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रस्तावना १७` भ्रन्थ रचनेका क्या प्रयोजन, इसमें कौनखा विषय अहण किया गया है, यह भअन्थ्‌ किस वस्तुके साथ सम्बन्ध रखता है और अन्थ पढनेका मधि- कारी कौन है? इस अनुवन्धचतुष्टयका विचार करना चाहिये. हमारे आर्यवर्तकी संस्कृति अति प्राचीन हे. इतनी प्राचीन है कि जिसकी संख्या वर्षामि नदीं दौ जा सकती, सूर्यं जोर चंद्र स्रष्टाने जब सर्जे तव उलकरे साथ ही आयवितेक्ी उच्च संस्कृति भी निपजी. जिसके उदाहरण- रूप वेदवेदाङ्कादि षट्श्ाख्र, बष्टादश्च पुराण पं श्चुति स्पृतियां जज भी विद्यमान दै. परन्तु ‹ काटो जगद्भक्षकः > इश्च विधानाजु्तार परिवतैनशीछ इस विश्वमें कालबछसे इस संर्छृतिका दिवसाचदिवस् ভাত হীরা বাঘা. होता जा रहा दै-न जाते अभी भी इसका किठता हास होगा । इस संस्कृतिको निवाहनेके लिये आपे अन्थोंका पठनपाठन जअत्या- वश्यकीय है; लेकिन आज इस बातकी किसको पडी है| तिस पर भी खबर ज्ञान प्राप्त कर * निर्माणमोह्ा जितसंगदोषाः बनना तो दुनिया रहते हुए व्यवद्दारवद्ध जनोंके लिये कठिन दूँ तो फिर अध्यात्मज्ञानकी तो बात ही कां १९ “ अध्यात्मविद्या विधानाम्‌ ” श्रध्यात्मजझान दही सख्य बिया है, वही कल्याणकारी है. 'इस जीवका आवज्वन विखजन मिटकर मोक्ष- भ्राप्रिरूप पुरुषायै इतके विना साध्य नही, › यद्‌ प्रयोजन ? दृष्टि समक्ष रखकर इस अन्यकी रचना ग्रन्थकर्ताने कीयीं है, और वेदान्तकी जटिल समस्याएं, चेदान्तके अति गुढ प्रश्न सासान्य - छोकिफ वा व्यावहारिक, पौराणिक मोर वैदिक दष्टान्तो द्वारा दल किये हैँ. परमात्मज्ञाच कूट कूट कर इसमे भर दिया ই. वेदान्तकी बातें करनी सहली हैं, लेकिन नियमॉका पालन (वेद न्तका আকাল होने घर भी ) करना व तद्नुसार आचरण करना बडा कठिन दे. घौर भी भन्य कई कारणोसे वेदान्त रुक्ष मालम दोता है, इस लिए उसकी ष्वर्वा करनेकी भी किसीको इच्छा नदीं होती. डेकिन यदा पर यह्‌. बात खनेथा विरुद्ध माऊछुम द्ोती दे. वेदान्तका विषय रूक्ष दने पर मी म्रन्थ- कत्तनें यह पुस्तक लिखकर हिन्दी भाषा के साहित्यमे बडी हलचल चेदा कर दी है, मोर बडी कमाल कीयी दे. सचमुच यद्द विदान्तका सुख अन्थ है? ऐसा कटद्दनेमें कुछ भी अतिशयोक्ति नदीं, अन्य पढते पढते मन इस विषये तरबतर दो जाता ई जौर चाचकको यद भी ख्याल नदीं रदता करि बह उस समय किख दुनियामे विष्वरता है. प्रकरण पीछे प्रकरण पढते दी लाध्ये, जग ग्य समय इसके पटनेके सिवाय व्यथ, रवाना न सख्चेगा.




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