प्रबंध - प्रदीप | Prabndha Pradiip

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : प्रबंध - प्रदीप  - Prabndha Pradiip
[adinserter block="2"]

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about रामरतन भटनागर - Ramratan Bhatnagar

Add Infomation AboutRamratan Bhatnagar

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
कविता का स्वरूप ३वाल्मीकि की रामायण से लेकर हरिओघध के प्रिय-प्रधास तक हम असंख्य कवियों और कविताओं से परिचित होते हैं । परन्तु यह दो बातें उन सभी कविताओं में मिलेगी जिन्हें हम सच्चे माने मेँ कविता कहते है । वाल्मीकि राम-सीता के वियोग का वर्णन जिन शब्दों में करते हैं, वही शब्द, वही भंगिमाएँ, वही भाव उत्कृष्ट कवियों में बार-बार दिखलाई देते है । इसका कारण यह है कि मनुष्य की “प्रकृति बराबर समान रही है और उसके मूल भावों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है । जब कवि प्रतिदिन के साधारण और वैयक्तिक अनुभवों से ऊपर उठकर सामान्य मानुषी स्वभाव शओरौर तञ्जन्य सुख-दुख की बात कहता है, तव उसका कान्य देश-काल की सीमाओं कोपार कर सावेभौमिक श्रौर सावकालिक हो जाता है। बाल्मीकि सीता-राम के परिणय के गोत गाते हैं तो हरिऔध लगभग ऐसे ही प्रसंग फो सामने लाकर कृष्ण के प्रति राधा के अनुराग का चित्रण करते हैं ।प्राचीनों ने कबिता के कुछ ऐसे विभाग भी किये हैं जिनका आधार उनका विषय-विस्तार और निर्वाह का ढंग है। यह भेद है. महाकाव्य, खंडकाव्य, गीतिकाव्य, नाट्यकाव्य और चम्पू । महाकाव्य, खंडकाव्य, नाट्यकाव्य और चम्पू कथात्मक हैं । गद्यकाव्य कथात्मक और वर्णनात्मक होता है। गीतिकाव्य अनुभूति-प्रधान | वैयक्तिक कविता का उदंश हमारी सम्बेदना को जगाना और हमारी सौन्द्य-बोध की प्रवृत्ति को उत्तेजना देना हे । मनुष्य को दूसरे मनुष्य से स्वाभाविक सम्बेदना होती दहै । अतः श्रेष्ठ काव्य में किसी व्यक्ति के दुख-सुख की कथा होना आवश्यक है । हर, भय, विषाद, प्रेम, इष्यो, हं ष, अहंकार, माता का पुत्र के लिए




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now