गाँधी - मानस | Gandhi Manas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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“क्यों व बुद्धि का फल हम प्रां ? सुस के साधन क्यों न जुटावे ? बटो वटो प्रतिमा कै वले, कदे चलो वप्त जलसे-थलये ! थागे बढ़ना লীঘ हमारा, यही ज्ञात है ज्ञेय हमारा । यही धर्म है, यही कर्म हैं, बल का शासन सत्य-मर्स है, और सभी দলা है झूठे, भाग्य सदा नि्ल के रूठे । स्वय নব जा श्रप्री करता, प्रभु भी उत्तकी जेवें भग्ता? | यही वकी कानून चना था, लीलामय की साया से; चुद्धि-चाद मानव में कलका, जिस छलिया की छाया से । नशा राजसी बल-सग्रह का, कारण बनता हे विश्रह का। बनी विविध विकयल मशीनें, श्रिविध काम मानव के कनं | जो था शासक होने आया, उसे लोॉह ने दास बनाया | काले काले यन्त्र लगाये, या विनाश कै बीज उगये ?




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