भगवान महावीर और उनकी अहिंसा | Bhagvan Mahavir Aur Unki Ahinsa

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Bhagvan Mahavir Aur Unki Ahinsa by महावीर - Mahaveer

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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धन नही रखेगे। इस प्रकार सीमा बाघ लेने से हमारी लालसा कम होती जायेगी और हम एक सीमा तक ही लौकिक कार्य, व्यापार आदि करेंगे और अपना बचा हुआ समय व घन दूसरों का उपकार करने भौर अपनी आत्मा की उन्मति मे लमा सकेंगे । यही नही, इसके फलस्वरूप, उपलब्ध वस्तुओ का वटवारा भी अधिक से अधिक व्यक्तियों में हो सकेगा। तात्पय यह है कि यदि भगवान महावीर के इस उपदेश का पालन किया जाये तो आज जो वर्ग- सघष हो रहा है वह स्वयमेव ही दूर हौ जायेमा । इस विषय पर हम एक अन्य दृष्टिकोण से भी विचार कर सकते है । ससारमे किसी मी ग्यक्तिकी तृष्णाओ भौर इच्छामो की कोई सीमा नही है । हमारी एक इच्छा पूरी हो नही पाती कि अन्य अनेको नई इच्छाएँ आकर खड़ी हो जाती हैं । यही दशा तृष्णाओ की भी है। यदि आज हमारे पास एक लाख रुपया है तो हम दस लाख पाने की तृष्णा करने लगते हैं, और जब दस लाख हो जाता है तो एक करोड पाने की तृष्णा हो जाती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि किसी भी व्यक्ति की तृष्णाओ व इच्छाओ का कोई अन्त नही है। अपनी तृष्णाओ व इच्छाओ की पूर्ति के लिये हम तरह-तरह के अन्याय व अत्याचार करते हैं और अनु- चित साधनो का प्रयोग करते है। और ऐसा करते समय हम इस बात की तनिक भी चिन्ता नही करते किं हमारे इन कार्यों से अन्य व्यक्तियों तथा पशु-पक्षियो को कितना कष्ट हो रहा है। विडम्बना तो यह है कि यह सब अन्याय व' अत्थाचार करने के पश्चात्‌ भी यह निश्चित नहीं होता कि हमारी सभी तृष्णाएँ व इच्छाएं पूरी हो ही जायेगी । इन अन्यायो व अनुचित साधनों के फलस्वरूप व्यक्तियों मे १५




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