अस्तित्व वाद | Astitav Vaad

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Astitav Vaad by महावीर - Mahaveer

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about महावीर - Mahaveer

Add Infomation AboutMahaveer

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
हा का शोर सताब 4 जिरे सहययत्र ह1 था वरशा में पकाय की निशाणावतत मी व्थितिया वे। प्रविता उिउचउ “जि मिलता क्‍्यारि वह जानते है दि निशा या ग्रसफबता मनुष्य वे हाल या प्रतुर अर है । विचार के गरा जमाया निगाह यो दूर ४1 िया जो उक्ता ) उमर वे द्वारा मा उसे निराशा अय गमायाते पव 11 वर सत्र । क्यारि पढ़ाया संत्राय या वियय (००९०) था हल और सर मात ररर चर वा प्राशाव _हता। ब्रेन बह रहा” कि हब विशिया सौर 61 श्षवातता ह सात ही मत्रु व शो लीता चाहिय। प्रवापर था साम उसपर उस अपर खावन में स्पापित उरसा चाहिय। विशधा हुए होम से भाया का बध्य ते शात्र उसे यह माल जना चाहिश एक निया हख गंव्ास संत्झ जायत के प्रयस अ्ग' इसलिए उससा मन अर पे साव उत्तरतीविय युण सातेत लीयने प्रतीत + ना चाहिय । उप रूप से यह मालयतावार के विस्य यात जाता ह परिन यरिगत स्पततनता उपर हॉयिव प्रनाव की सतत मारा व तिमाश में यक्ति उतना यर सब चार्जो मंत्र रूप में मलयायाहा ७) पह सावां सानयताबाल ह क्याति हसम प्रधाव शरीम भानयतायाह जे प्रयेययाटा यो ज्यनित णुस्त हटाए लिये ए+ | आर बामना 1 4 महूव जाया ने या खिद्ध कर लिए हे कि प्रयाध ग्ेपान मानव“वाट लाता मंत्र परवेश पर आधा रस था मावया्ा पृ था जिसका बट संम्यवा ग्रावार नेगी 11 न्र्न्प्ड




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now