श्री पुरपार्श्वनाथ स्तोत्र | Shree Purpaarshvnath Stotra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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प्रस्तावना { १५ রক, তম রন কাতর নি শা জজ, উজ 008 है तो शीघ्र अन्वेषण-द्वारा इस महत्वकरे प्रन्थरमका पता लगाया जा सकता हे | विक्रमकी ९३बीं शत्ताब्दी वक इसका पता चलता है। आचाय विद्यानन्द्रने तो अपने उत्तरवर्ती प्रायः सभी प्र्थोंमे इसके उल्लेख किये द्वी हैं । किन्तु उनके चार-सौ- पॉच-सो वर्ष बाद होनेवाले धादी देवसूरिने भी अपनी विशाल टीका 'स्पाद्ादरत्नाकरसे इसका मासाल्लेख किया है ओर साथमें उसकी एक पक्ति भी उद्धत की ह › । इससे इस अन्यकी जहाँ प्रसिद्धि ओर महत्ता प्रकट है! बहाँ १३वीं शताब्दी तक अस्तित्व भी सिद्ध है २. तत्त्वाथश्लोकवात्तिक-यह आचार्य उमास्वाति (गृद्ध- पिच्छाचाय) रचित तत्त्वारथसूत्रपर लिखी गई पारिडत्यपूं विशाल टीका है। जैनवाइमयकी उपलब्ध कृतियोंमें यह एक वेजोड़ रचना है ओर तत्त्वाथंधृत्रकी टीकाओमें प्रथम श्रेणीफी टीका है। भारतीय दशनमन्योमिं भी इस जैसा ग्रन्थ शायद ही मिलेगा । यह मुद्रित दो चुका है, परन्तु शुद्ध और सुन्दर सस्करणक्री खास जरूरत बनी हुई है। ३. अश्सदसी-यद स्वामी समन्तभद्गके देवागम (आप्त- मीमांसा) स्तोन्रपर लिखा गया महत्वपूर्ण टीका-मन्थ है । विद्यानन्दने अपने पूर्वंज अकलझुद्ेवको अष्टशतीके प्रत्येक पद- वाक्यको इसमें अनुस्थृतत करके अपनी विलक्षण प्रतिभाद्वारा उसके सर्मको खाला दे। यद्द प्रन्थ भी मुद्रित हो चुका है और शिक्षा केम निदित है । २ देखो, स्यादादरताकर प° ३४६ ।




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