कला सृजन प्रक्रिया | Kala Srijan Prakriya

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Kala Srijan Prakriya by शिव कारन सिंह - Shiv Karan Singh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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नवम तरंग अभिरुचि पृ० २०१-२२५. कला श्रौर भ्रभिरुचि पृ० २०३, अ्रभिरुचि का स्वरूप पृ० २०२-४, विभिन्न भाषाओं में इसके लिए प्रयुक्त शब्द पृ० २०५, व्युतपत्तिपरक व्याख्या पृ० २०५, परिभाषा २०५-७, कलाकार की अ्रभिरुचि सामान्य व्यक्ति की श्रभिरुचि से भिन्न पृ० २०७, श्रभिरुचि का उद्भव श्रौर विकास पूृ० २०७-८, श्रभिरुचि श्रौर निर्येय पृ० २०८, अ्रभिरुचि के प्रकार, साहित्यिक भ्रभिरुचि पृू० २०८-६, कृत्रिमता और ,वाह्याइंबर की रुचि पृू० २१०, अन्यायदेशिक की रुचि पू० २११-१२, विद्रप और विकृत अभ्रभिरुचि पू० २१२-१३, साहित्य रूपों से संबंधित रुचि पू०. २१३-१४, हास्य की रुचि पृू० २५१४-१५, त्रासदी की रुचि पृ० २१४-२१६, कलात्मक रुचि में परिवतंन के कारण पू० २१६-१८, सामयिक भ्रभिरुचि श्रौर कालगत चेतना पृ० २१८१६. श्रभिरुचियों के प्रति विद्रे षमूलक दृष्टिकोण से कलात्मक श्रमिरुचि मेँ बाधा पृ० २१६-२०, प्रसिरुचि के प्रतिमान पृ० २२२-२४, उत्कृष्ट अभिरुचि शौर निकृष्ट श्रमिरचि पू ० २२४-२५, निष्कर्ष पृ० २२५ । ति तृतीय उल्लास दशम तरंग प्रतिभा ओर विधायक कल्पना ` पु° २२९-२६२ संस्कृत काव्य-शास्त्र श्रोर प्रतिभा प° २२६-४१, विषय प्रवेश पृ० २२६- ३०, व्युत्पत्ति पृ० २३०, काव्य हेतु के सन्दर्भ में प्रतिभा प्‌० २३०, श्रभिनव गुप्त की प्रतिभा संबंधी मान्यता पू० २३०-३२, कुल और क्रम-सिद्धान्त पूृ० २३२-३३, पतंजलि का मत पृ० २३३, शेव-दशंन की मान्यता पृ० २२४, हेमचन्द्र पृ० २३४, भामह, वामन, भ्रानंद वधंन के विचार पृ० २३५, दण्डी २३५, राजशेखर पू० २३६-४०, जीनियस संबंधी पाइचात्य मत पृ० २४१-२५४३, प्रतिभा ईश्वर प्रदत्त पृ० २४१, ड्यरर और देकातं का मत पृू० २४२-४३, श्टूवों शताब्दी तक अ्चलित देवी प्रेरणा का सिद्धान्त पृू० २४३, रेपिन और प्रलेवजेण्डर गेराङं प° २४२-४४, व्युत्पत्ति, ्रभ्यास श्रौर प्रतिभा पू० २४४-४५, जो शुभ्रा रेनॉल्ड पृ० २४३, एडिसन पृ० २४५-४६, यंग २४६०-४७, प्रतिभा की प्रवचेतनीय धारणा (लीबनिज़) पृु० २४७-४८, सुल्जुर पूृू० २४८, हडंर प० २४६, काण्ड हीगेल, शापेनघ्रावर श्रौर शेलिग पू० २५०-२५३, कोलरिज




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