जैन तत्त्व प्रकाश | Jaintatvaprakash

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Jaintatvaprakash by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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इस ग्रंथके कत्तोका संक्षित जीवनचरिज्र, मारवाड देशके मेडते शहरके रहीस मेंदरमार्गी वे साथ ओ- सवाल कॉसटीया गोतके भाई कस्तुस्चंदजी व्यापार निमितते मालवाके आसटे ग्राममें आ रहेये, उनका अकस्मात आयुष्य पूर्ण होनेसे उनकी सुपत्नी जवाराबाइने वैराग्य पाके ४ पुत्नोंको छोड साधमार्गी जेन पंथमें दीक्षा ली और १८ वर्ष तक संयम पाला, मातापिता व पत्नीके वियोगकी उदासी से शेठ केबलचंद भोपाल शहरमें आ रहे और पिताके धमोनुसार मंदीरमार्गीयोंके पंच प्रतिक्रणण, नव स्मरण, पूजा आदि कंठाग्र किये. उस वक्त श्री कुबरजी ऋषिणी भो- पार पधारे उनका व्याख्यान मुननेकु भाइ फुलचंदनी धाडीबाल केबरूचंदजीको जवरदस्तीसे ले गये. महारानभीने छुयग डांगनी सूत्रफे चतुथे उद्देशकी दशमी गाथाका अर्थ समझाया, जिससे उन्को ष्या- ख्यान मातिदिन सूननेकी इच्छा हुई. शनेः शने। प्रतिक्रमण, पच्ची- स वोलका थोक इत्यादि अभ्यास करते २ दिक्षा लेनेका भाव हो गया. परंतु भोगावली केके जोरसे उनके मित्रोंने जबरंदस्तीसे हुलासावाइके साथ उन्का रुन केर दिया. दो पुत्रको छोड बो भी आयुष्य पूणं कर ग्‌, पत्र पारनाये, सम्बन्धीयोकी भरणा तीसरी वक्त व्याव फरनेके स्यि मारषाड जाते रस्तेम्न पूज्य श्री उदेसाग- रजी महाराजके दर्शन करनेकों रतलाम उतरे, पहां बहुत शातरके जाण, भर युवानीमें सजोड शीरुत्रत धारन करनेवाले भाई कस्तुर- चंदजी केवलूचंदजीको मिले, जो उनको कहने रंगे कि, “ वि- पका प्याल्ा सहज ही गिर गया, तो पुनः . उसको भरनेको क्यो तैयार होते हो ? ” यो कहते उन्को पूज्यश्रीके पास ले गये. 'पूज्य- श्रीने कहा ; “ एक वक्त वैरागी वने ये अब वनदे ( बर ) बननेकों तैयार हुये क्या ! ” इत्यादि बचनों सुण केवलचंदजी अह्मचर्यत्रत धारण कर भोपाल गये. दिक्षा लेनेका विचार स्वजनोंकों दशाया




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