संस्कृत काव्य के विकास में जैन योगदान | Sanskrit Kavya ke Vikash Mein Jain Kviyon ka Yogdan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१६ संस्कृत काव्यके विकासमें जेन कवियोंका योगदानभूखा आ सकता है, जिनके प्रोत्साहनसे यह ग्रन्थ प्रकाशित हो रहा हैं। में ज्ञानपोठके सभी वरीय पदाधिकारियोंके प्रति अपना हादिक आभार व्यक्त करता हूं ।श्री डं. ए. एन. उपाध्येके प्रतिं भी नतमस्तक हूं, जिनके स्नेह भौर समालोचनसे लाभान्वित हुआ हूँ । अन्तमें अपने गुरु पृज्य श्री पं० कैलाशअरदजी शास्त्री, वाराणसोके चरणोंमें भी श्रद्धाभक्ति व्यक्त करता हूँ, जिनके आशीर्वादसे यह ग्रन्थ लिखा गया ।सहयोगियोमे श्री डँ. राजाराम जैन गौर श्रो पं० रामनाथ पाठक प्रणयीका भो उपछृत हूँ, जिनसे प्रेरणा और प्रोत्साहन प्राप्त हुमा । प्रफ संशोधनका कार्य श्री पं० महादेवजो चतुर्वेदीने किया है। उनकी इस सत्कृपाके लिए भी मैं आभारो हूँ ।इस प्रयासमें सहयोग देनेवालोंमें मैं अपनी घर्मपत्नो श्रोमतों सुशोलाजीको भी साधुवाद देता हे, जिनको कर्मठताके कारण मैं घरेलू विन्ताओसे मुक्त रहकर साहित्यदेवताकी आराधनामें तत्पर रहता हूँ । अन्तपें सभो सहायता करनेवाले महा- नुभावोंके उपकारका स्मरण कर अपना आभार व्यक्त करता हूँ ।भोलाभवन, १, ने|मिचन्द्र शास्त्री महाजन टोलो, आरा




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