महापुरुषों की जीवंगाथाएं | Mahapurusho Ki Jivangathaye
श्रेणी : जीवनी / Biography, शिक्षा / Education

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
2 MB
कुल पष्ठ :
144
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)रामायण
भज्बडिन कर् सोना से वोट, “ देवि! मुझे आज आपके कुछ अनिष्ट
होने की आशा होरही है। इसछिये आप इस मत्पूत अम्नि-व्त्त
के बाहर पदार्पण न कं---अन्यया आपका कुछ अश्युम घटित
जायगा । ” इधर राम ने अपने एक तीझ्ण शर से उस माया-मृग
को ग्द कर दिया आर् बह तस्क्राउ अपना स्वामात्रिक रूप धारण
कर पश्चच को प्राप्त होया |
उसी क्षण पण-बुठि के समीप राम का यह आर्व-छर
सुनाई पड़ा, “दौडो ठक््मण, मेरी सहायता के लिये दोडो |”
मीता ने यह सुनकर ठक्ष्मण से तकाछ राम कौ सहायतार्थ बन में
जाने को का | टस्मण बोडे, ¢ देमि ! यड रामचन्द्र की कण्ट-प्वनि
नहीं हे । ” किन्तु सीता के यार् वार् सानुकरो अनुरोध करने पर
छक्ष्मण राम की खोज में चन की ओर चछे गये | उनके जाते ही
राक्षस-राज रायण साउनयेप में ऊुटि के द्वार पर आ खड़ा हुआ और
मिक्षा-याचना करने डगा। सीता वोर्ठी, “ आप कुछ क्षण प्रतीक्षा करें |
तय तक मेरे स्वामी आजाते है--फिर मैं आपको ययेष्ट मिक्षा
दूँगी | ” साधु बोण, “ मै अयन्त क्षुषा्त हूँ, देगि ! एक क्षण भी
अतीक्षा करने में असमर्थ हैँ | आप मुझे जो आपमे पास हे वही
देदें |” इस पर सीता कुटि में रखे हुये जो थोड़े बहुत फछ थे
उन्हें बाहर छे आई | जब छम्म-वेष धारी साधु ने देखा कि वे अप्नि-
बत्त के भीतर से ही मिक्षा दे रही हैं तो पद अत्यन्त विनय-यूक
बोछा, “ देवि ! कापराय-वस्मधारी साधुओं से क्या भय ! आप
बाहर पदार्षण कर सुगमता से भिक्षा प्रदान करें | ” इस अनुनय-
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