घासीलाल जी महाराज का जीवन - चरित्र | Ghashilalji Maharaj Ka Jivan Chritr

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Ghashilalji Maharaj Ka Jivan Chritr by रूपेन्द्र कुमार जी - Roopendra Kumar Ji

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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३ ५ सिद्ध कर दिया है कि जैनधर्म की उत्तत्ति न तो श्रीमहावीर के समय में ओर न श्रीपार्शनाथ के समय में हुई किन्तु इससे भी चहुत पहले भारतवप के अति प्राचीन काल में वह अपने अस्तित्व का दावा करता' है.। उन्होंने अपने भाषण में कहा था” जैनधर्म एक मौलिक धर्म है यह सत्र धर्मों से सर्वधा अलग और स्वतंन घर्म है | इसलिए प्राचीन भारत वर्प क तचज्ञान ओर धार्मिक जीवन के अभ्यास के लिए यह. बहुत ही महत्व का हे | कई विद्वानों का यह श्रमपूर्ण मत है कि जैन धर्म वेद(धर्म की ही शाखा है | और उसके आदि प्रवर्तक श्रीपाश्चनाथ या श्रीमहावीर खामी थे । इस भ्रमपूर्ण॑मान्यता का खण्डन हम वेदों, पुराणों और अन्य ग्रन्थों के प्राचीनतम उद्धरण देकर करेंगे | दुनियां के अधिकांश बिद्रानों की मान्यता दै कि आधुनिक उपध समस्त ग्रन्थों मं वेद्‌ सवते पराचीन ই | अतएव अच बेदों के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयत्न करेंगे कि वेदों की उत्पत्ति के समय जैनधर्म 'विद्यमान था। वेदानुयायरियों की मान्यता है कि वेद्‌ इश्वर प्रणीत हैँ । यद्यपि यह मान्यता केवल श्रद्धा गम्य ही है तदपि इससे यह सिद्ध होता है कि खष्टि के ग्रारंभ से ही जैन धर्म प्रचलित था क्योंकि ऋग्वेद, यजु्वेंद, सामवेद और अथर्ववेद्‌ के अनेक मंत्रों में जैन तींर्थंकरों के नामों का उल्लेख पाया जाता है। ऋग्वेद में भगवान श्रीऋषभदेव को पूर्वज्ञान का प्रतिपादक और ढु;खों का नाश करनेवाल्य बतलाते हुए. कहा है-असूत पूर्वा इषमों ज्यायनिमा अरय झुरुधः सन्ति पूर्वी; । दीवो न पाता विद्धस्थ धीभिः क्षेत्र राजाना प्रतिबोदधाये || ऋग्वेद ॥ २(३४।२॥ जैंसे जल से भरा मेघ्र वर्षा का मुख्य स्रोत है, जो प्रथ्वी की प्यास को बुझा देता है, उसी प्रकार पूर्वी ज्ञान के प्रतिपादक श्रीऋषभ देव महान है। उनका शासन वर दें | उनके शासन में ऋषि परम्परा से प्राप्त पूर्व का ज्ञान आत्मा के शहुओं-क्रोधादि का विध्वंसक हो । दोनों संसारो और मुक्त आत्माएँ अपने ही आत्मगुणों से चमकती है | अतः वे राजा है-वे पूर्णशान के आगार है और आत्म-पतन नहीं होने देते । (पूर्व ज्ञान के छिए देखिये आगे का टिप्पण) चौदह पूर्वैः--. तीथ का प्रबतैन करते समय तीथकर भगवान जिस अशे का गणधरों को पहले पहल उपदेश देते अथवा गणधर पहले पहल जिस अर्थ को सूत्र रूप में गूंथते हैं, उन्हें पूर्व कहा जाता है । पूर्व चौदह' १ (१) उत्पाद पूर्वै -इस पूर्वं म सभी दन्य ओर सभी पयायो के उत्पाद को लेकर प्ररूपण की गई है। उत्पाद पूव मे एक करोड पद्‌ रै | „^, (२) अग्रायणीय पू --इस मे सभी द्रव्य, सभी पर्याय और सभी जीवों के परिमाण कां वर्णन है | अग्रायणीय पूर्व में छियानवें ल्वख पद हैं । নল (३) वीर्यप्रबाद पूर्व--इसमें कमे सहित और নিনা মাত जीव तथा अजीबों के वीर्य (शक्ति) का वर्णन है । वीर्य प्रबाद पूर्व में सत्तरछाख पद हैं । ६. _ ' (४) अस्तिनास्तिप्रवादू--संसार में धर्मास्तकाय आदि जो बस्तुऐँ विद्यमान हैं तथा - आकार बड ज अविदयमान हैं, उन सब का वर्णन अस्तिनास्ति राद में हैं । इस मं साठ लख पद है | (७) ज्ञानप्रवाद पूर्च--इसमें मतिज्ञान आदि ज्ञान के पांच भेदों का तित ४. हर ॥ र 4 वेस्त्रत' वर्णन ৬ करोड पद है । ह है | इसमें एक




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