जिन ज्ञान दर्पण १ | Jin Gyan Darpan 1
श्रेणी : साहित्य / Literature
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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
10 MB
कुल पष्ठ :
361
श्रेणी :
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लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)( ७ )
मुधारस निर्मल ध्यायन ॥ पास्या केवल नाग ॥ वागा
मरम घर जन वहू तारिया | 1तसिर हरय जग माग |
मु०॥२॥ फटिक सिंहासग जिनजी फावता |
तम आशोक उदार | छच चासर भामंडल भलकतो |
सुर ददुभि सिणकार | सु० ॥३ ॥ पुष्प विष्टि वर
मुर घ्वनी दौपती ॥ साहिव जग सिणगार ॥ अनंत
ज्ञान दर्शन सुख वल घर ॥ ए दाद्ण गुगा ग्रीकार ॥
सु० ॥ ४ ॥ वाणी अमी सस उपशस रस भरी ॥
टुगंति নল कपाय | शिव सुखना अरि शब्दादिक
कच्या | जग तारक लिन राय ॥ सु० ॥५॥ अंतर
जामीर शरण आपरे ॥ हु' थायो अवधार | जाप
तुमारोर निश दिन ससर | भशरगागत सुरकार |
मु०॥ € ॥ संवत उगगीसंरे मुदि पर्त भाद्रवे।
वारस संगलवार | सुमतिजिगेप्रवर तन লক
रव्या | आनन्द उपना अपार | सु ॥ 9॥
प्रदम जिनस्तवन् ।
( किदवेगी देगी हे सुणनगते वगपनतके परेशी )
লিন তা जिसा प्रभु । पद्म प्रभु पीढागण + सथ-
से लीधो दिए मम | पाया चोश्ोनाण। णद प्रभ
नित्य समरियि | $ | ए ग्रांकगी। ध्यान शुक्र प्रभु
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