तुलसी सतसई सटीक [श्रीराम सतसई सटीक ] | Tulsisatsai Satik (shriram Satsai Satik)
![तुलसी सतसई सटीक [श्रीराम सतसई सटीक ] - Tulsisatsai Satik (shriram Satsai Satik) Book Image : तुलसी सतसई सटीक [श्रीराम सतसई सटीक ] - Tulsisatsai Satik (shriram Satsai Satik)](https://epustakalay.com/wp-content/uploads/2019/05/tulsisatsai-satik-shriram-satsai-satik-by-gosvami-tulaseedas-vaijnath-kurmi-184x300.jpg)
[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutGosvami Tulaseedas
Add Infomation AboutVaijnath Kurmi
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
15 MB
कुल पष्ठ :
488
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखकों के बारे में अधिक जानकारी :
गोस्वामी तुलसीदास - Gosvami Tulaseedas
No Information available about गोस्वामी तुलसीदास - Gosvami Tulaseedas
वैजनाथ कुर्मी - Vaijnath Kurmi
No Information available about वैजनाथ कुर्मी - Vaijnath Kurmi
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)तुलसीसर्तसरं । ६५.
कारश्च .मश्च यः । रस्याकासेमयोनादः रयादीषैसखररमयः॥
मकरे ग्यञ्जनं बिन्दवः प्रणव्माययोः पुनः रेफ परद्यरूप कोटि
मूथैवर् प्रकाशमान श्रीरघुनाथजीके नेत्रनको तेज॑है ( यथा महा-
रमायणे ) ^ तेजोरूपमयो रेफो श्रीरामाम्यककञ्नयोः । कोटिसये-
: प्रकाशश्च.पर्रह्न स उच्यते ” पुनः रेफकी अकार बासुदेवको को:
रन है कोटि कामसम शोभायमान सो श्रीरघुनाथजीके मुखको
तेज है ( यथा ) “रामास्यमरडलस्यैव तेजोरुपं वरानने॥ कोि-
कन्द्पशोभाव्यं रेफाकाये दि विद्धि च ॥ अकारः सोपि रूपश्च
वासुदेवः स कथ्यते ” पुनः मध्यश्चकार बलबीयेवान् महाविष्णु
को कारण है सो श्रीरुनाथजीके बषस्थल को तेज है ( यथा )
“मध्याकारो महारूपः श्रीरामस्यैव वक्षसः। सोप्याकारो দা
विष्णुबलं वीयैस्य कथ्यते” एनः मकारकी जो अकार दै सो महा-
शम्धको कारण है सो श्रीखुनाथजीके कणिजिहुनी को तेन
है (यथा ) “ मत्स्याकारो भवेदृषः श्रीरमकटिजारुनी । सोप्य-
कारो महाशम्भुरुच्यते यो जगदुगुरुः ” पुनः मकारको व्यश्नन
सो सामूल प्रकृति महामाया को कारण सो श्री रघुनाथजीकी
इ्छाप्रत हे (यथा) “ इच्ाभ्रतश्च रमस्य मकारं म्यञ्जनं च्
यत् । सा मूलप्रकृतिज्षेया महामायास्वरुपिणी ” इत्यादि ३७ इणे
बल दोहा है॥ १६ ॥
दाह ॥
ज्ञान विराग मक्त सहः मूरति ठलसी पेखि।
बरणतगात॑मतश्रनुहरत,मसाहमांबिशदाबंराख १७
ज्ञान बेराग्य भक्तिसहित श्रीरामनामकी. जो मूर्ति है तिहिको
पेखि कहे देखिके जहांतक मेरी मतिकी गति है तहां तकं विशद
User Reviews
No Reviews | Add Yours...