जगमगाते हीरे -भाग 1 | Jagmagate Heere: Vol-I

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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राजा राममेहन राय ७ सामने खीचते हुए सरकार की कड़ी आलोचना करते थ ¦ स्पष्ट ओर सत्य बात कहने में ज़रा भी (न हिचकते थे। साथ ही उन्होने इस बात का भी भरपूर प्रयत्न किया कि भारतवर्ष मे रजी शिक्षा और पाश्चवात््य ज्ञान का प्रचार किया जावे ताकि भारतीय शिक्षित और सम्पन्न हा । विलायत यात्रा मे वे, इद्धलैण्ड, ऋन्‍्स आदि देशो के गए, वहाँ अपनी अपूव प्रतिभा ओर पाण्डित्य से योरोप निवासियों पर अच्छी वाक जमा ली। सब जगह उनका अभतपूब स्वागत हुआ । अन्त से अपने शान्तिमिय जीवन म धमां पदेश करते हुए वहा के त्रिस्टल नगर मे सन्‌ १८३२ ३० मे १० ११ दिनि बीमार रह कर व स्वगं सिधारे । राजा राममाहन राय का मस्तिष्क बहुत बडा ओर मेधा- शक्ति बडी प्रबल थी । शरीर कान्तिमान ओर सुन्दर था । शारी- रिक बल साधारण लोगो से कही अपिक देखा जाता था । एक २ दिन से वे २-१० উহ दूष पी जाते ये ओर उसके उपर भोजन भी करते थे। उनके जीवन को अनेक घटनाएँ उनकी विद्वधत्ता, बुद्धिमानों,, दया, उदारता, वाक्चातुरी, शारीरिक बल, निर्मीकता गदि गुणो का परिचय देती है । एकं दिन एक परिडत ने आकर उनसे कहा, “में आप के साथ तन्त्र शाख विषय मे अमुक ग्रन्थ पर विचार करना चाहता हूँ ? | राय ने वह अन्थ टेखा तक न था “ वहतं अच्छा ` कहते हुए कहा “ कृपा कर कल आइए ” । पण्डित जी के जाते ही उन्होने वह দন্ত तुरन्त मगवाया ओर दत्तचित्त होकर उसे एकबार ही पढ कर हृदयड्रम कर लिया | दूसरे दिन जब परिडत जी आए तो जोरों से शाख्रा्थ हुआ | अन्त में रामसेहन के पाडित्य तथा तक-शक्ति से परास्त हो कर पडत जी अपने घर चले गए ¦




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