श्री कृष्ण | Shriikrishn

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Shriikrishn by विद्याभास्कर शुक्ल -Vidyabhaskar Shukl

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ६ ) पहले वही हेढ ते | कुछ खाते, कुछ लुह़काते, फिर खेलते कूदते अपने घर आते । गोइुल की ओरतों ने जवर देखा कष्ण के मारे दही, माखन मिलना मुश्किल है तो वे उसे छींकों पर रखने लगीं | इतने पर भी उनकी बचत न होती थी। श्रीकृष्ण 3ट, पत्थर, ख।ट, मोडा जा मिलता उस पर चढ़कर छींके से दहेडी उतार लेते ओर खा जाते | चलते समय दहेड़ी भी फोड जाते | इसी तरह एक दिन श्रीकृष्ण ओर बलराम दुसरे ग्वाल-बालों के संग एक ग्वालिनी के घर में घुस गये | ग्वालिनी घर में नहीं थी। इधर-उधर देखा | उपर ताका | दही, माखन की दहेडियां बहुत ऊंचे पर रखी थीं। सब सोचने लगे--इतने ऊँचे से माखन केसे उड़ाया नाय । इतने में कृष्ण बोले--“ठहरां, ठहरो, मेंने तरकीब सोच ली । एक लड़का उटकुरुवां घोड़ा बन जावे | उसके ऊपर दूसरा घोड़ा बनकर बेठ जावे | उसके ऊपर तीसरा | फिर में सब से ऊपर चढ़कर दहेड़ी उतार दूँगा।” बस, सब लड़के एक दूसरे पर घोड़ा वनकर बेठ गये। सब के ऊपर कृष्ण खुद चढ़कर छींके तक पहुँच गये | बलराम ने बगल में खड़े होकर सहारा दिया। दो दहेडी नीचे दे दी । एक पटक दी । एक छींके पर ही टेढ़ी कर दी । दही गिरने




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