षटखंडागम | The Satkhandagama Vol-xv

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The Satkhandagama Vol-xv(1957) by आदिनाथ नेमिनाथ उपाध्ये - Aadinath Neminath Upadhyeडॉ हीरालाल जैन - Dr. Hiralal Jainपं. बालचंद्र सिद्धान्त शास्त्री - Pt. Balchandra Siddhant-Shastriश्री फूलचंद्र - Shri Fulchandra

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पं. बालचंद्र सिद्धान्त शास्त्री - Pt. Balchandra Siddhant-Shastri

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श्री फूलचंद्र - Shri Fulchandra

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हीरालाल जैन - Heeralal Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ४७ ) उदी रणाका रवामी कोई भी मिथ्यादृष्टि श्रथवा सम्यग्दष्टि जीव दह्‌ सकता हे । अवक्तव्यउदीरणका स्वामी सम्भव नहीं है । एक जोवकी अपेक्ता कालकी प्ररूपणामे भुजाकारउदीरणाका काल जघन्यसे एक सेमय श्चौर ক্ষন হী समय मात्र बतलाया है जो इस प्रकारसे सम्भव है--कोई उपशान्तकपाय जीव वहसे च्युत होकर सक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानवर्ती हुआ | वहाँ वह पाँचसे छह प्रकृतियोंकी उदीरणा करनेके कारण भुजाकारउदीरक हो गया । इस प्रकार भुजाकार उदीरणाका जघन्य काल एक समय प्राप्त हुआ । पुनः बही द्वितीय समयमें मृत्युछो प्राप्त होकर देवोंमें उत्पन्न हुआ। वहाँ उत्पन्न होनेक प्रथम समयमें वह छह प्रकृतियों से श्राठका उर्दीरक होकर भुजाकार उदीरक ही रहा | यहाँ भ्ुज़ाकार उदीरणाका द्वितीय समय प्राप्त हुआ । इस प्रकार भ्रुजाकार उदीरणाका उत्कृष्ट काल दो समय मात्र प्राप्त होता है । अल्पतर उदोरणाका भी काल जघन्यसे एक समय ओर उत्कपसे दो समय मात्र है। बह इस भ्रकारसे- प्रमत्तसंयतके श्रन्तिमि समयमे भयुकमेकं उदयावलीमें प्र वष्ट हो जानपर वह श्राठसे सात प्रकृतियोंकी उदीरणा करता हुआ श्नल्पतर उदारक ह्‌ गया । इस प्रकार अल्पतर उदर णाका जघन्य काल एकं समय प्राप्त हुआ । तत्पश्चात्‌ तोय समयम प्रमत्त गुणस्थानको प्राप्त होनेपर वद वेदनीय कमके विना রুহ प्रकृतियाकी उर्दीरणा करता हुआ अल्पतर उदीरक हां रहा | इस प्रकार श्रल्पतर उदीरणाका काल भी उत्कपस दो समय मात्र ही पाया जाता है । अवस्थित उ्दारणाका काल जघन्यस एक समय ओर उत्कपसे एक समय अधिक एक श्रावलीस हीन तेतीस सागरापमप्रमाण हूं । दवाम उत्पन्न हं।नक प्रथम समयमें पॉच, छुह या सातसे आठका उदीरक होकर भुजाकार उदीरक हुआ | पुनः द्वितीय समयसे लकर मरणावली प्राप्त होने तक अवस्थितरुपसे आठका ही उदारक रहा । इस प्रकार अवस्थित उदारणाका उत्कृष्ट काल प्रथम समय और अन्तिम आवलीको छोड़कर पूण दव पयायप्रमाण ततस सागरापम मात्र ध्राप्न हा जाता ह्‌ । अन्तरप्रहूपणाम सुज्ञाकार उदारणाके श्रन्तरपर विचार करते हुए उसका जघन्य श्न्तर एक या द समय मात्र बतलाय। ह्‌ । यथा--पाच प्रकृतयाका उद्‌रक कदं उपशान्तकषाय नीचे गिरता हुआ सुक्मसाम्परायिक दवाकर छहका उदारक हुआ। तत्पश्चात्‌ द्वतीय समयमे भी वह छुहका ही उदीरक रहा । इस प्रकार भुजाकार उदारणाका अवांस्थत उदीरणास अन्तर हुआ। पुनः तृतीय समयमे मरकर वह देवोंमें उत्पन्न हों आठका डउदारक हं।कर भुजाकार उदीरणा करन लगा। इस प्रकार भुजाकार उदीरणाका एक समयमात्र जघन्य अन्तर प्राप्त हा জালা ই । उसका उत्कृष्ट अन्तर एक समय कम तेतीस सागरोपम प्रमाण है । बह इस प्रकारस- कोई जीव तेतास सागरोपभ्॒ आयुवाले देवोंमें उत्पन्न होकर उत्पन्न दोनेके प्रथम समयमे भुजाकार उदीरक हुआ आर द्वितीय समयसे लेकर मरणाबली प्राप्त होनके पूत्र समय तक बह अवस्थित वदीरक रहा । इस प्रकार उसका इतना अन्तर अवस्थित उदीरणासे हुआ। तत्पश्चात्‌ मरणावलीक प्रथम समयमें वह आयुक জিলা सात ५क्रांतयोका डर्दीरणा करता हुआ अल्पतर उर्दीरक हो मरणावली कालके अन्तिम समय तक अर्वास्थत उद्दंरक रहा। तत्पश्चात्‌ मरणको प्राप्त होकर সন্তান उत्पन्न हुआ आर उत्पन्न हानेके प्रथम समयमे पुनः भुजाकार उदीरक हुआ। इस प्रकार भुजाकार उदीरण का अवस्थित ओर अल्पतर उदीरणाओस एक समय कम पूरे तेतीस सागरोपम काल तक न्तर रहा | आगे चलकर इसी भुजाकार उदीरणाकी प्ररूपणामें नाना जीवोकी अपेक्षा भंगविचयकी अतिसंक्तेमें प्ररूपणा करते हुए भागाभग, परिमाण, क्षेत्र, स्पशन, काल, अन्तर और भाव; इन सबकी जानकर प्ररूपणा करनेका निर्देशमात्र किया गया है ।




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