श्रीमद आचार्य भीषणजी के विचार - रत्न | Shri Mad Aacharya Bhishanjee Ke Vichar Ratn

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ £ ] सम्बत्‌ १८१४ की बात है। एक ऐसी घटना घटी जिसने भीखणजी के जीवन में एक महान परिवर्तन कर दिया । मेवाड़ मे राजनगर नामक एक शहर है। वहाँ पर उस समय आचार्य श्री रुघ- नाथजी के बहुत अनुयायी थे। इन अनुयायियों में अधिकांश महाजन थे ओर कई आगम रहस्य को जाननेवाले आवक थे। साधुओं के आचार-विचार को लेकर इनके मन में कई प्रकार की शंकाएँ खड़ी हो गई थीं और बात यहाँ तक बढ़ी कि इन शआवकों ने आचार्य श्री रघनाथजी की सम्प्रदाय के साधुओं को वन्दना नमस्कार करना तक छोड़ दिया। इन श्रावकों से चर्चा कर उन्हें अनुकूल लाने के लिए भीखणजी भेज्ञे गये। भीखणजी ने राजनगर में चौमासा किया और आ्रवकों को समझा कर उनसे वंदना करना शुरू करवाया। श्राबकों ने बंदना करना तो स्वीकार किया परन्तु वास्तव में उनके हृदय की शकाएंँ दर नहीं हो सको थीं । उन्होने स्वामीजी से साफ कहा भी कि हमारी शंकाएँ तो दूर नहीं हुई हें परन्तु आपके विश्वास से हम लोग वंदना करना स्वीकार करते हैं । गुरु की आज्ञा को पालन करने के लिए भीखणजी ने कुछ चालाकी से काम लिया था। भीखणजी ने सत्य के आधार पर नहीं परन्तु अपने व्यक्तित्व कै प्रभाव से ओर भ्रूठ का आश्रय लेकर श्रावर्कों को बंदना करने के लिए राजी किया था। इस प्रकार भीखणजी आत्म वंचना का जहर पी गये। गुरु ओर साधु आत्म-वश्चना का विष--ः




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