श्री सहजानन्द शास्त्रमाला के प्रवक्ता | Shri Sehjanand Shastramala Ke Parvakta

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Shri Sehjanand Shastramala Ke Parvakta  by मूलचंद्र जैन - Moolchandra Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ॐ चारौफये रकी गदे किर प्क छोक के त्रिषयका संबंध प्रस्येश्त छोक के चौथे चरण से रकखा गया है. ऐसी विशेषता बहुत क॒प्र পন্থা में देखने को मिली है। इस गीता की ये दिरी टीका खुद मदाराज ने ही श्र्ववारथ के साथ की है जिससे छोकों के रहरुष को समभने मे वड सरलता टो गईं है। सटीक गीता वाद में छुपेगी । गीता में अध्यात्मतत्त्व ही मरा हुआ है, जो संस्कृत के जानकार दिद्वान हैं वे गीता के रहस्य को ठीक २ सप्तक सकते दें। फविता में लालित्य अच्छा दे । अचुपास, अलंकार आदि सेमी खुशोमित है। इस प्रकार मद्दाराज् के द्वारा रचित भ्रस्थोंमें इस चौथे अन्य के प्रथम खंड को पाठकों के दाथ में सत्पंण करते झुए परंम दे दो रहा है । इस ४ संतोवत श्र सम्बादत करने में पूणे सावघानो रुकी गड्ढे है फिए भी कई कारणों के साथ 'मेरा प्रभार और अशद्ौन सी एक कारण दो समता है जिससे कहीं २ कोई संशोधन ভাবী স্তুতি বহু गई दो तो पाठकइन्द क्षमा फर ओर खुघार कर पढ़े तथा शाल्रमात्ञाके कार्याक्षय को सूचित करते रहें ताकि आगे के एडीशन में उनका छुघार करः दिया जाय । इत्यलम्‌ ¦ , नि. सं. २७७६ इन्दौर । सुभालाल जेन का. ती




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