प्राचीन जैन इतिहास भाग 3 | Prachin Jain Itihas Bhag 3

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Prachin Jain Itihas Bhag 3 by मूलचंद्र जैन - Moolchandra Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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५ तसय भाग (४ ) एक हजार वर्षफी मावकी यु थी और दश पुष्य ऊंचा शरीर था | (५) जापके साथ खेलनेको स्व॒गेसे देव बाते थे और आपके बच्ध तथा जाभूषण भी देवलोहसे जाते थे | (६ ) एक दिन मगधघदेशके रहनेवाले एक वेश्यने राजगृहके स्वामी जरासिंधुसे द्वारिका नगरीक्ली सुंदरताका वर्णन किया। यह सुन- कर्‌ जरात क्रोधसे अघा होगया भोर युद्धको चढदिया | नारदने यह स्र भरीरप्णङ सुनाई। सुनते ही श्रीकृष्ण श्चुझ्लो मार्नेके लिए तेयार हुण। उन्हेंने श्रो मेमिकुपारसे कहा कि भाव লে नगरकोी रक्षा कोजिए | झवघिज्ञानकें घरीी प्रसशचित्त नेमिकुमारजी अघुर नेत्रेसि हंसे और जो कट कर स्वीकारता दी । नेमिक्रुमारके ईसनेसे श्रीक्ृष्णने विन्यक्रा निश्चय कर छिया। (७) एक सपय जाप कुमार णदस्थामें झपनी भावों ( श्रीकृष्णकी रानियों ) के साथ जल्क्रीड़ा करते थे। स्नान फरनेफे আবু উন তথ उन्‍्हंने सत्यभामासे सपनी घोती घोनेकनी फहा | सत्यमामाने तानेके साथ ऋहा-क्या जाप कृष्ण है, सिन्द नागशस्पापर चढ़कर थारंग नामफा तेनवान धनुष्प चंदृ।या णी सब दिशार्थोंक्ने फेपादेनेवाल। शंख बजाया है। ऐसा साहयका राम भाषते नरह सेहत | (८) सच्यभामाकोी बात नश ठे শানু यहां पहिले तो ये महासर नाप थेयापर ले चढ़ाया और बादमें मरनी भावामसे सब दिशा 5




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