विधवा - कर्तव्य | Vidhawa - Kartavya

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Vidhawa - Kartavya by बाबू सूरजभानुजी वकील - Babu Surajbhanu jee Vakil

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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द, बेकली होती है आर हृदयमें सुईयाँ सी चुभती हैं, चाँदी सोने- के थालोंमें सजे हुए सत्तर प्रकारके स्वादिष्ट भोजन अब उसको कृट्वे मालूम होते हैं । खानेको देखकर उसे उबकाई आती है और टुकड़ा हलकके नीचे उतरना भारी हो रहा है । चारों तरफ किरती हुई बाँदियाँ अब उसको जहर दिखाई दे रही हैं, हाथी घोड़ोंको देखकर तो अब उसे रुलाई आती है। हीरे मोती जड़े हुए गहने ओर जरी लिपटे हुए भड़कदार रेशमी कपड़े अब उसको ऐसे घिनावने लगते हैं कि उनमें दियासलाई लगा देनेगो जी चाहता है। रुपये पेसे ओर माल दोलतको देखकर वह झँझलाती है ओर मन ही मन गुस्सा खाकर कहती है कि अब यह मेरे किस कामके । उसकी कोठीके गुमाइते और कारिन्दे अब उसकी ही आज्ञा मान रहे हैं, बिराद्रीवाले भी उसीको पूछने आते हैं ओर सरकारी हाकिम भी अब उसका ही लिहाज करते हैं; लेकिन इस पूछ-पुर्शिश ओर मान-गोनसे उसको कुछ भी खजी नहीं हो रही है, बल्कि वह तो अपने उनही दि्नोको याद्‌ कर करके रोती है जब कि वह सुद्‌ ही अपने स्वामीकी दासी बनी हुई थी ओर बाँदी गुलामकाी तरह टहल करते हुए भी जब वह अपने मालिककी सेकडों झिड़कियाँ सहती थीं, जब कि घर बाहर सब जगह ओर सब बातोंमें उसके मालिककी ही चलती थी ओर उसकी कुछ भी पूछ नहीं थी; बल्कि उसको खुद भी हरएक काममें अपने पतिकों ही पूछना पड़ता था। इस वक्त वह खुद मुख्तार हे,




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