कहानी और कहानीकार | Kahani Aur Kahanikar

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Kahani Aur Kahanikar by रामलाल पुरी - Ram Lal Puri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१ कहानी क्‍या है ? (९) साहित्य में कहानी का स्थान ः--अनन्‍्त काल से सनुष्य चित्र, मूर्ति, संगीत, कविता आदिं भिन्न-भिन्न ग्रणालियों के द्वारा अपनी भावनाओं को च्यक्त करता चला आ रहा है । भावनाओं की इसी असिव्यक्ति अथवा _ आविष्करण को कला कहते हैं। साहित्य भी एक प्रकार की कला है, ऐसी कल्ा जो हमारे मस्तिष्क की जिज्ञासा-वत्ति को हो शांत नहीं करती वरन्‌ मानव- जीवन को अधिक सुखो और मंगलमय देखना चाहती. है । भावना और कल्पना के संसार मे जीवन जिस रूप में दिखाई देता है, साहित्य उसी की ्मालोचना, व्याख्या और उद्भावन्ता करता रहता है। स्पष्टतः साहित्य का प्रभाव अन्य कलाओं की अपेक्षा अधिक विस्तृत है । जिस प्रकार कला का सम्बन्ध किन्हीं विशेष नियसों से नहीं होता, ठीक उसी अकार साहित्य भी विशेष नियमों से वद्ध नहीं । साहित्य सरिता की तरह स्व॒तन्त्र है, लेकिन स्व॒तन्त्रता के साथ सदैव स्वेच्डाचारिता का भय लगा रहता है, वस इसीलिए साहित्य- शाख्त्रियों को छुछ अनुशासन को आवश्यकता पढ़ी और समय-समय पर आवश्यकताजुसार कुछ ऐसे नियम बना दिये गए, जिन पर चलना सचके लि लाभदायक सिद्ध हुआ धीरे-धीरे संग्रह रूप मे हमारे सामने नो साहित्य था, मूल रूप में वही काव्य के नास से संबोधित किया जाने लगा । अपने-अपने देश के साहित्य को वहाँ के लोग काव्य-प्रन्थ के नाम से पुकारने लगे । साहित्य और काव्य का यह भेद केवल व्यवहार की दृष्टि से किया गया, जिसे अन्त- गत गद्य-पद्य ओर गद्य-पद्म का सस्मिश्रण, संस्कृत में जिसे चम्पू कहते ददै, सममा नाने लगा । कालान्तर में शब्दों को पारिसाषिक रूप देने तथ्य साहित्यिक अभिव्यक्ति के लिए व्यवहार की दृष्टि में काव्य के सी दो भेद कर दिये गए “एक गद्य-काज्य और दूसरा पद्य-काव्य । पद्य-काव्य के अन्तर्गत कविता




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