जैन पूंजांजलि | Jain Pujanajali

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Book Image : जैन पूंजांजलि  - Jain Pujanajali
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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जैन पूजांजलिराग द्धेघ शुभ अशुभ भाव से होते पुण्य पाप के बध | साम्य भाव पीयाषामृत पीने वाला ही है निर्बन्ध ||श्री जैन पूजान्जलि एवं चतुर्विशति तीर्थकर विधानॐ नम सिद्धेभ्यअभिषेक पाठमै परम पूज्य जिनेन्द्र प्रभु को भाव से वन्दन करं । मन वचन काय, त्रियोग पूर्वक शीश चरणों में धरं ॥१॥ सर्वज्ञ केवलज्ञानधारी की सुछवि उर मे धरं ।निर्ग्रन्थ पावन वीतराग महान की जय उच्चर ॥२॥ उज्जवल दिगम्बर वेश दर्शन कर हृदय आनन्द भरू । अति विनय पूर्वं नमन करके सफल यह नरभव करू ॥३॥ मै शुद्ध जल के कलश प्रभु के पूज्य मस्तक पर करं ।जल धार देकर हर्ष से अभिषेक प्रभु जी का करूँ ॥४॥मै न्हवन प्रभु का भाव से कर सकल भवपातक हरूँ।प्रभु चरणकमल पखारकर सम्यक्त्व की सम्पत्ति वरू ॥५॥जिनेन्द्र - अभिषेक -स्तुतिमेने प्रभु के चरण पखारे 1 जनम, जनम से संचित पातक तत्क्षण ही निरवारे ।॥१॥ प्रासुक जल के कलश श्री जिन प्रतिमा ऊपर ठरे । ˆ वीतराग अरिहंत देव के गूंजे, जय जयकारे ॥२॥ चरणाम्बुज स्पर्श करत ही छाये हर्ष अपारे ।| पावन तन, मन नयन भये सव दूर भये अंधियारे ॥३॥




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