आधुनिक हिन्दी साहित्य में समालोचना का विकास | Aadunik Hindi Sahithya Main Smalochan Ka Vikash

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Aadunik Hindi Sahithya Main Smalochan Ka Vikash by डॉ. वेंकट शर्मा - Dr. Venkat Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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রা में एक स्वतन्त्र प्रकरण जोडनेका था, किन्तु तेसा करते हुए मुभे करई स्थलो पर विचारों की पुनशवत्ति भी करनी पडती तथा विषय की परिमिति के कारण य उसमे शोध-कंतियो कां केवल सामान्य परिचयमाच्र ही दे पाता, श्रत; मनि उपसहार के भ्रन्त्गेत यथाप्रसंग उनका विशेष उल्लेख करना ही पर्याप्त समझा है। यदि कोई नवीन श्रनुसन्धाता 'शोध-कार्य द्वारा समालोचना-यृद्धि! विषय पर उसका समुचित मूल्यांकन करते हुए श्रपना भ्रध्ययत प्रस्तुत कर सके तो यह भी एक महस्वपुर्ण कायं हो सकेगा, क्योंकि श्राज की शोध-कृतियो के सम्यक्‌ परीक्षण की भरावदयकता सर्वेश्र श्रनुभवकी जा रही है । अपने विषय-निर्वाचन, सामग्री-लचयन भौर तथ्य-प्रतिपादन शभ्रादि के सम्बन्ध में मैंने इस भूथषिका के रूप में जो प्रात्म-निवेदन किया है, उसके भ्राधार पर प्रस्तुत प्रबन्ध की भैल हृष्िट का-म्प्नुमान लगाया जा सकता है। वेसे तो आधुनिक साहित्य की विकासमान प्रगति के सम्मुख मौलिकता का दावा करना दस्भमात्र है, किन्तु फिर भी मैंते इस बात का यथागव्त प्रयत्न किया है कि मैं ঘন कार्ये-क्षेत्र की परिधि में उन तथ्यों का उद्घाटन कर सकूँ जिनका आधुनिक हिन्दी- समालोचना के विकास से पूर्वापर-विधि में श्रत्तरंग और बहिरंग सम्बन्ध रहा है । यदि इस प्रबन्ध में समीक्षा-विकास के भ्रन्तर्गत कुछ बातें छूट भी गई हैं तो उसका प्रमुख कारण मेरी सीमित शक्ति के साथ-साथ उनकी वेशिष्ट्य-विहीत साधारण स्थिति भी है। इसी प्रकार समालोचना की प्रपुख प्रवुत्तियों श्रौर उनके अनुयायी समालोचकों की मान्यताओं के अहापोहों में अधिक न उलभककर मैंने केवल उनकी प्रमुख विचारधाराओ्ों का ही विवेचन करते हुए यथावसर अपना श्रभिमत प्रकट कर दिया है । इससे अधिक विवेचन का भ्रवकाश मेरे शोध-प्रबन्धों में हो ही नहीं सकता था, क्योंकि यवि मैं मूल्यांकन और विचार-प्रिर्म्श के विस्तृत वाग्जाल मे उन्नक जाता तसो मेरे विवेच्य विषम के विकासानुक्रम मे एक बहुत बडा व्यवधान उपस्थित हो जाता । ऐसी परिस्थिति में यदि युग-प्रवृत्तियों श्र समालोचको के विश्लेषण में उनको विवेचना के कुछ प्रसंग श्रनालोचितं* रह गये हों तो उन्हें मेरे शोध-विषय की सीमा को दृष्टिगत रखते हुए उदार दृष्टि से ही ग्रहणा धिया जाना समीचीन है । ~ ~ अपने शोध-प्रबन्ध में मैंने जिस अभिव्यंजन-प्रणाली को ग्रहण किया है उसे विवेधनात्मक प्रणाली कहा जा सकता है । वस्तुत किसी भी साहित्यागि के प्रवतरेने भौर विकास को बोधस्य बनाने के लिए यह प्रणाली श्रत्यन्त उपादेय सिद्ध होती है। इसके हारा हमे विषय कां पंयोअन निरूपण शौर मूत्याकन करने मे विशेष सुविधा रहती है । चकि मेरा प्रधान विषय श्राधुनिक हिन्दी समालोचना के चिकास का विश्लेषण करना था, अत कतिपय स्थलों पर मैंने श्रपत्ती मानसिक ग्रभिभूमिका के अनुरूप ऐतिहासिक, तुलनात्मक, प्रभावाभिव्यजक श्रौर निर्णायक प्रवृत्तियों का भी प्रयोग किया है किन्तु विवेचन का क्रम भंग न हो इस विषय की मैंने यथामति चेष्टा की है। इसी प्रणाली का अनुगमन करने से ही मैं उस उपलब्ध सामग्री से तथ्य-चयन कर सकता था । प्रस्तुत प्रबन्ध के प्रगायन में भूके हिन्दी, सस्कत शौर अंग्रेजी साहित्य के अनेकालेक ग्रन्थों तथा पत्र-पत्रिकाशों से यथोचित धहायता मिली है, जिनकी सूची परिशिष्ट के भ्रन्तर्गत दी गई है। प्रयाग विश्वविद्यालय के पुस्तकालय और हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन, प्रयाग के संग्रहालय द्वारा ^ भी मैं अपनी, अनुशीलन-विषयक सामग्री का सचयन करने में यथेष्ट लाभान्वित हुआ हैँ । विभिन्न विश्वविद्यालयों तथा अनुसन्धार्न-परिषद्री द्वारा प्रकाशित शोध-अबन्ध भी मेरे भ्रध्ययन में सहायक रहे हैं। साहित्य के मर्मज्ञ विद्वानों की कृतियों ने भी मेरा प्रनेक बार पथ-प्रदक्षत किया है; श्रत सबके प्रति भ्राभार प्रदर्शित करता मैं अपना आथमिक कत्तेव्य समझता हैँ । इस अ्रवसर पर मैं अपने प्रारम्भिक शिक्षा-गुद पं० दाम्भुदयालओी त्रिपाठी के प्रति श्रद्धावनतं हूं जिन्होंने मेरे बाल-मानस में साहित्याभिदचि का' अंकुरण किया। प्रयाग-प्रचितवास के




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