डायरी के कुछ पन्ने | Dayri Ki Kuch Panne

55/10 Ratings. 1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Dayri Ki Kuch Panne by पारसनाथ सिंह - Parasnath Singh

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about पारसनाथ सिंह - Parasnath Singh

Add Infomation AboutParasnath Singh

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
तो गांधीजी का चेहरा लाल हो गया । सामान ज्यादा न था; किन्तु एक भी पैसा अधिक खचं होः, यह गांधीजी को अरसद्य था ! पेटिर्यो सारी गनी मे लायी गयी थीं, किन्तु गांधीजी को सनन्‍्तोष न हुआ । पूरा घंटा तो उन्ह अपनी मण्डली को धमकाने में ही लगा | अन्त में तय हुआ कि थोड़ा-सा सामान छोड़- कर वाकी अदन से वापस आकर दिया जाय | गांधीजी बोले- “आज तो में इस सामान को देखकर घबरा गया हूँ। कागऱज़ रखने के लिए भी ये लोग पेटी लाये हैं, मानो में अब पुरानी आदतों को छोड़ने- वाला हू | पाँच बजे अपने बैठने का स्थान छुनने के लिए गांधीजी छत पर आये। मैने कहा-“जहाज़ का अन्तिम हिस्सा तो बहुत हिलता है, इसलिए काफ़ी कृष्टप्रद है । एक मिनट भी सुमसे तो यहाँ खड़ा नहीं रहा जाता, इसलिए इसे देखना ही फ़िजूल है । जहाज के बीच का हिस्सा ही देख ले |” गांधीजी कहने लगे कि इसको भी तो देख लें और मेरे लाख विरोध करने पर भी जहाज़ के अन्तिम हिस्से का एक खतर- नाक कोना पसन्द किया। में तो हक्का-वक्का-सा रह गया। क्‍या कोई समझदार मनुष्य ऐसी तकलीफ़ से नौ




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now