डायरी के कुछ पन्ने | Dayri Ki Kuch Panne
श्रेणी : कहानियाँ / Stories

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4 MB
कुल पष्ठ :
178
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)तो गांधीजी का चेहरा लाल हो गया । सामान ज्यादा
न था; किन्तु एक भी पैसा अधिक खचं होः, यह
गांधीजी को अरसद्य था ! पेटिर्यो सारी गनी मे लायी
गयी थीं, किन्तु गांधीजी को सनन््तोष न हुआ । पूरा
घंटा तो उन्ह अपनी मण्डली को धमकाने में ही
लगा | अन्त में तय हुआ कि थोड़ा-सा सामान छोड़-
कर वाकी अदन से वापस आकर दिया जाय |
गांधीजी बोले- “आज तो में इस सामान को देखकर
घबरा गया हूँ। कागऱज़ रखने के लिए भी ये लोग
पेटी लाये हैं, मानो में अब पुरानी आदतों को छोड़ने-
वाला हू |
पाँच बजे अपने बैठने का स्थान छुनने के लिए
गांधीजी छत पर आये। मैने कहा-“जहाज़ का
अन्तिम हिस्सा तो बहुत हिलता है, इसलिए काफ़ी
कृष्टप्रद है । एक मिनट भी सुमसे तो यहाँ खड़ा नहीं
रहा जाता, इसलिए इसे देखना ही फ़िजूल है । जहाज
के बीच का हिस्सा ही देख ले |” गांधीजी कहने लगे
कि इसको भी तो देख लें और मेरे लाख विरोध
करने पर भी जहाज़ के अन्तिम हिस्से का एक खतर-
नाक कोना पसन्द किया। में तो हक्का-वक्का-सा रह
गया। क्या कोई समझदार मनुष्य ऐसी तकलीफ़ से
नौ
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