हिन्दी के कवि और काव्य भाग 3 | Hindi ke kavi Aur Kavya Bhag 3

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Hindi ke kavi Aur Kavya Bhag 3 by पं गणेशप्रसाद द्विवेदी - Pt. Ganeshprasad Dwivedi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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आलम कृत माधवानल-कामकंदला इस कवि के सबंध मे आरभ से ही हिंद्दी संसार में एक श्रांत धारणा फैली हुई है, ओर वह यह कि 'माधवानल-कामकदल! के आलम ओर “आलमऊंलि' के लेखक आलम दो अभिन्न व्यक्ति है ! आलम केलि क रचयिता तथा शेग्ब रैँंगरेजिन के प्रेम में पड़ कर मुसलमान हां जान वाले आलम (जो पहले जाति के ब्राह्मण थे) का रचना काल संवत्‌ १५४८-६० तक माना गया है । पर माधवानल-कामकंटला के रचयिता आलम का रचना काल स० १६४० या ३० १५८४ धा । इनका रोख रग रेज़िन स कोई सरोकार नहीं था ओर न इनके जाति के ब्राह्मण होने का ही कोई प्रमाग है । हिंदी साहित्य के सभी इतिहास लेखकों ने आलम के संबंध में यह भद्दी भूल की हे। स्पष्ट है कि यह भूल प्रथम इतिहास लेखक से आरंभ हुई और बाद के सभी इतिहास लेखक आँख मूंद कर इस भूल का अनुकरण करते বা । अस्तु, आलम केलि व: रचयिता विशुद्ध ब्रज भाषा में झद्भार संबंधी फुट कर पदों की रचना करते थे, पर प्रस्तुत आनम अवधी के कवि थे और इनका रचनाकाल उनमे ठीक सो वप पहले का था। सन नो से इक्यानुवै आइ | करो कथा अब बोलों নাহি || सन्‌ नो से इक्यानवे हिज़री ओर तदनुसार से १६४० में इन्होंने इस ग्रंथ की रचना की। उस समय दिल्ली के सिंहांसन पर सम्राट अकबर विराजमान थे ओर इनके अथेसचित्र राजा टॉडर मत्न हमारे कवि के आश्रयद्वता थे। ग्रथारंभ में कवि न दोनों की प्रशंसा की है । दिलिय पति अकबर सुरताना। सप्त दीप में जाकी आना ॥ विहन पति जगन्नाथ सुहेला । श्रापनु गुरू जगत सब चेला। जब घर भूमि पयानो करई | वासुक इंद्र आसन थर थरई ॥ [क মাপ ০৩ পর । 8 1 ৯৮১০) পা শপ এপ পর १ यदि किसी भी साहित्य के इतिहास लेखक न माधवानल-कामकंदला' को देखने का कष्ट उठाया होता तो इस आंति का निराकरण कभी का हो गया होता | पर कट सत्य यह है कि आज के हिंदी साहित्य के इतिहास' ग्रंथों के अध्ययन के फलस्वरूप नहीं लिखे गये ई , बढिक पिछले लेखकों की नक़त्न के श्राधार पर | वास्तव में साहित्य के इतिहास लेखन से बढ़ कर कर श्रमसापेक्ष और उत्तरदायित्व पूणं काई दुसरा काम नहीं है, पर हिंदी में तो जितने साहित्य के स्रष्टा नहीं हैं उनमे अधिक इतिहास लेखक दो रहे हैं ओर नक़ल से बढ़ कर आसान कोई काम होता भी नहीं !




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