आधुनिक हिंदी नाटक की भाषा में सर्जनात्मक क्षमता के विकास का अध्ययन | Adhunik Hindi Natak Ki Bhasha Me Shrijnatmak Kshamta Ke Vikas Ka Adhyayan
श्रेणी : साहित्य / Literature

लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
139 MB
कुल पष्ठ :
393
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
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की यह सर्जनात्मक शक्तित ग्रहणकर्णा को केवठ बमिधात्मक ज्यँ की प्रसिकाया' का
बाँध नही कराती, वल उसे ऋुमूतियाँ की तह में पहुँचने का कसर अ्दान करती है |
वाज के नटन की मुख्य चिन्ता थं की उन््मुक्तता पर अभिक कैन्द्रित है धं की
निश्चितता' पर तहीं । उजनात्मक माणा मूतः वील्वाठ की ही माणत हाँती है,
चिकी धमता रचनाकार की प्रतिमा शर अआुमू्ि में पककर परिवर्धित सं विकसित
होती भतती है। टी०9 एस० इचियट मैं कहा-+ .. कयि का मानस वस्तुतः देखा पात्र
हे जौ अगिनत कुमूर्तियाँ, वाक्याशों और विरम्य कौ पकक स्यरह कता एष्ता हे । वै
तव तक वशे पदै एते ईं क्य तक यै सव दंश उख स्प में उकटठे नहों हौ जाते कि एक नये
फम्रिया की पचमा के चिरि संयुक्त हो से । 7
भाव बीए माणा के उद्गम का अश्म वत्यधिक विवादास्पद है, पर यह अश्म काव्य
মানা ই जुड़ा हुआ है इसलिए हससे जबा' नहीं जा सकता | टी09 एस० हलियट के पुं
धीर् पार्वान्त्य साहित्यकार मै माणा कौ महत्वपूर्णः स्यान दिया, किन्तु দানা के
बाद | उन्होंने माला কী লালা কী कटा माना । 8० रप एचियट तरै कष
पाणा भावी की कटाणिी नशे वस्त माणा हे सवद है! माव, वेनाः जर्
कमव का सरटे हीता है, जिप्की जपाएशिलि पामा होती है। क्ती वस्तु या
घटना के प्रति वटस्य एषम मनै विनारय्ठतेई। माव का काश्य रती तदह ष्मा
जा सकता है। जिस दी मा तक व्यक्ति तटस्थ पए्हता है उसी धीमा तक मार्षा या विना †
का उदैलन हाँता है। 387: में साझा में भावाँ की यृच्टि होती है। यदि माष
किसी दिशा पिशैष' में सक़िय हाँता है ती माणा मे । भान मे उत्पन्भ मये « गये
पयेबा- বলাকা কী অন্দুতি শী আক रचना का কস धारण करते हैं| दृश्य कछाकार
इस प्रक्रिया से व गूजरता' ही ऐसी बात मी । उसके अन्दर मी स्वप्रयम साणा मेँ
मार्वों की दाया লিঘলাদ रहती हे, फिसे वह वुश्यकठा' में दाका करता ₹। भाष
की यह एक सहज स्थिति है कि ये जब उद्मूत हाँते मैं तो माचा में । यह मात वहा
हे किवे सिः. गि होते । प्रतीक निर्माण की उह्य प्रक्रिया के कारणः मानव ~
धस्तिष्क হুর इस अकार विकसित हो चुका है कि साझा के चिना দাদা का. वस्वा
पती स्य रज घम्मव नि । माव कीरमाभा का प्रश्व बस्तित्व के अध्म से कुहा इश
| শামা আছি पुष्टि रै, दिर माणा ক चिना व्यक्ति ऑस्थित्ववान गही का
सकता | साथ और भा ढे स्न शै व्यक्तित्व और मानस के प्रश्न ये कक देखा
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