भारत और चीन | Bharat Aur Cheen

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गंगा रत्न पाण्डेय - Ganga Ratna Pandey

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डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन - Dr. Sarvpalli Radhakrishnan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भूसिका २१ एक एसा क्षेत्र हं जिसमे लोग वड सरलता से मतान्ध वन जाते हे, लेकित चीन का धर्म एक आह्वादपूर्ण ढंग से इस बराई स सक्तह्‌ । परस्पर छिद्रास्वेषी धामिक विवादों के घ॒म-धुन्ध से चीत फा जीवन दूषित नहीं हो पाया। राजवीतिक कारणों से लोगों को ताड़ना दी गई हैं; लेकिन यह ताडना योरोप के धामिक युद्धों श्रथवा धामिक परीक्षयों और दण्डों की विभीषिका तक कभी नहीं पहुँच पाई। चीनी लोग रूड दान्तों के दास नहीं हें और न वे मानव-प्रकृति की पृक्कार तथा उसके सक्रिय तके और उदार-भाव के प्रति उदासीन ही है। तर्क शौर र्‌ बुद्धि ने कला, साहित्य और धर्म के क्षेत्र से अन्ध-विश्वास और वरबादी को दूर करने में वड़ी सफलता पाई है। गम्भीर दिपयों पर विवाद करते समय भी चोनी लोगों में विनोद-व॒त्ति रहती है। जित लोगों का विश्वास हैं कि मृतकों का अस्तित्व नहीं है और हइर्साः उनके प्रति बलिदान समय और अन्न का अ्पव्यय है---उनके इस ল पर विचार करते हुये श्री मो-त्सू कहते हें-“-“हम यह मच भी लें सृतात्माश्रों का अस्तित्व नहीं है तब भी बलिदान अपव्यय- नहीं है यदि मद्य तथा अन्य वस्तुएँ नाली में बहा दी जायें ठतव हो हम उसे- 'वेशक बरबादी कह सकते हें। लकित वास्तव में होता यह है कि परिवार के सदस्य और गाँव के सित्र गण ससी अपना-अ्पना भाग पते हैं; ইজ- लिए इस बलिदान की प्रथा का सदसे ब्रा लाभ इतना तो हे ही कि हमें अपने पड़ोसियों से श्रच्छे सम्बन्ध बनाये रखने में मदद मिलती है।! और लीजिए, सन्‌ २६५ ईसवी पूर्व में चित राज्य के भूठपूवे ५, এ নি / হু ৬/৪155: [175 ৬1৪ 200 [5 ৮০৬6 (1936), १८ ३९।




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