सर्वोदय - तत्त्व - दर्शन | Sarvoday - Tattv - Darshan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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चौदहउनके जीवनकाल मे ही सर्वोदिय-तत्व-दर्शन की रूपरेखा ज्ञात हो सकती थी । सर्वोदिय-तस्व-दर्शन का विकास मूलभूत सिद्धान्तों में परिवर्तन के रूप में नहीं दो रद्दा था, बह्कि सिद्धांतों के ब्यावह्गरिक विवेचन के या तफ़्सील की बातों सें देर-फेर के रूप में। सन्‌ १६३८ में हिंद-स्वराज्य? के बारे में उन्होंने कहा था, “तीस साल के तूफानी गीवन के बाद जिसमें से होकर में तथ (१६०६) से गुजर चुका हूँ मैंने ऐसा कुछ सी नहीं देखा जिसके काश्ण मुक्ते डन सिद्धांतों में परिवर्तन करना पढ़ा हो जिनका उसमें प्रतिपादन है ।!”१. ्एरियन पाथ' सितम्बर १६३८ ।




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