हिन्दुस्तानी कहावत कोश | Hindustani Kahavat Kosh

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एक विचार :

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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न. ४ / हिन्दुस्तानी कहावत-कोश जब किसी व्यक्ति से हम दूर रहना चाहते हैं तब उसके संबंध में क. | अनमिले के त्यागी रांड़ मिले बैरागी कोई औरत न मिली तो त्यागी मिल गई तो वैरागी । जव जैसा अवसर देखा तब तैसा करना । त्यागी विरक्‍्त साधु। वैरागी-वैण्णवों का एक संप्रदाय । विरागियों में स्त्री रखने का नियम है त्यागी स्त्री नहीं रख सकते । इसलिए क. ॥ अनहोत में औलाद गरीबी में बहुत संतान का होना अखरता है । अनहोनी होती नहीं होनी होवनहार जो होना है वह होकर रहता है जो नहीं होना वह नहीं होगा। भाग्यवादियों की उक्ति। अनाड़ी का सौदा बारा-बाट मूर्ख का कोई काम ढंग से नहीं हो पाता । वागबाट होनामारा-मारा फिरना नप्ट-भ्रष्ट होना । अनाड़ी का सोना वाराबानी मूर्ख का सोना हमेशा चोखा क्योंकि उसे खरे-खोटे की पहचान नहीं होती । सिराफों की भाषा में वाराबानी सोना बहुत बढ़िया किस्म के सोने को कहते हैं ऐसा सोना जो कई बार साफ़ किया गया हो ॥ अनोखी के हाथ लगी कटोरी पानी पी-पी भरी पड़ो री जव किसी नीच को कोई ऐसी वस्तु मिल जाती है जो पहले कभी उसके पास न रही हो तो वह उसका बड़ा घंमड करता है। अनोखी जुरवा साग में शोरवा मु. स्त्रि. शोरुवा मांस का ही बनता है पर उस मूर्ख स्त्री ने भाजी का ही शोरुवा बना दिया । अनाड़ीपन के लिए क.। जुरवान्जोरू स्त्री । अनोखे गांव में ऊंट आया लोगों ने जाना परमेसुर आया किसी गांव के लोगों ने ऊंट नहीं देखा था। एक बार जब वह उनके गांव में आया तो उन्होंने उसे परमेश्वर समझा । मूर्व लोग बिना देखी वस्तु के संबंध में नाना प्रकार की कल्पनाएं करते हैं। अनोखे घर कटोरी किसी घर में जब कोई ऐसी वस्तु आ जाए जो पहले न रही हो और उसका बहुत प्रदर्शन किया जाए तब क. । अन्न धन अनेक धन सोना रूपा कितेक धन अन्न ही सबसे बड़ा धन है सोना-चांदी उसके सामने कुछ नहीं । अन्नुख घर में नाती भतार पू. जिस घर में नाती का पति की तरह सम्मान हो उसे सचमुच अनोखा माना जाना चाहिए । अथवा अनोखे घर में नाती ही पति होता है। जहां बड़ों के स्थान पर छोटों की अधिक चले वहां क.। अपना-अपना खाना अपना-अपना कमाना एक-दूसरे पर आश्रित न रहना । अपना अलग धंधा करना | अपना-अपना घोलो अपना-अपना पिओ 1 स्वयं अपना प्रवंध करो हम किसी की जिम्मेदारी नहीं ले सकते । अथवा 2 अपनी विपत्ति स्वयं भुगतो । फिलन ने इसका अर्थ विस्तार से नहीं लिखा । वास्तव में इस कहावत का निकास इस कथा से है-किसी राजस्थानी को कुसुंभा यानी अफीम का घोल पीने की आदत पड़ गई थी। उसने अपने एक पड़ोसी को भी उसका चस्का लगा दिया । रोज उसे बुलाकर कुसुंधा पिलाता । उसके बाद जव देखा कि अफीम पूरी तरह इसके मुह लग गई है तो एक दिन उसके आने पर उसने घर के किवाड नहीं खोले और उपर्युक्त वाक्य कहा अपना-अपना टठंग है हर आदमी का काम करने का अपना तरीका होता है। अपना-अपना दुखड़ा सब रोते हैं सवको अपनी-अपनी पड़ी है हरेक अपने दुखों की शिकायत करता है अथवा हरेक को कोई न कोई परेशानी है। दे.--अपनी-अपनी सब... । अपना-अपना लहनिया है अपना-अपना भाग्य जिसे जो मिल जाए। लहनिया--प्राप्य । अपना-अपना ही है पराया-पराया ही है जहां अपना आदमी काम आ संकता है वहां पराया नहीं । अपना उल्लू कहीं नहीं गया अर्थात हम अपना मतलब तो निकाल ही लेंगे किसी न किसी को बेवकूफ बना लेंगे ।




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