कला का अनुवाद | Kala Ka Aanuvad

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१० - कला का अनुवाद सो, इस देवी का, मेरे घर मे, तुम्हारी गरहाजिरी में भी पधा- रना, मौलिक तो माना ही जाना चाहिये । मौलिकता की एक गतं शायद सुन्दरता भी हो । सो ये देवी विमरु शुभ्र-वसना श्रौर ऐसी नपी-तुली गठन की हे, कि तुम न हुईं, नहीं तो तुमने जरूर, 'नवागन्तुक से शीर्षक एक कविता ही लिखी होती । हाँ तो ये आईं है। मह-लगापन” जरा इनमे ज्यादा है । शायद यह स्वभाव तुम्हे पसन्द न हौ, किन्तु तुम्हारे कवि-जीवन के रिटायरिग नेचर से, ओौर तेता-जीवन के अभिनेतापन मे, जो मुँह का बनाना, एकान्त मे बेठना और सर-सपाठे लगाना है, उसमे इनका मूह लग जाने का स्वभाव, बहुत भायेगा। तुम्हारा कार तो अनंत ठहरा। वह तो कवियोँ का अनंत हं। पर मंतो गरीब इन्सान नामक जानवर हुँ । मर सुबह, दोपहर और शाम के बाद रात भी होती हे । मेरी उम्‌ के बरस होते हे, बरस के महीने, महीनों के दिन, दिन के घण्ट और घण्टे भी टुकड़ें-ट्कड़ें में बट होते है । म मृत हूँ, मुझे मृत साथी ही भाता भी हू । अकमंण्य; यानी दुनियाबी कामो मे लगा । तुम अमर हो, अमरादं का एकान्त तुम्ही को शोभता भी है । उस समय मेरा भी एक साथी हो, तो ভুল জী नाराजी होवे ? गत॒ दिसम्बर सन्‌, ३६ मे, हम तुम खड, तब तुमने कहा था-- “बहुत दूरी से--अपने पारिवारिक और आत्मीयता के आकषेण छोड़ कर, जो तरुणियाँ अपना जीवन सौपती हे, उन पर दृढ़ पड़ने के बजाय, उनका आदर करता चाहिये--तुम तो बस न जाने कंसे हो !”'




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