प्रसाद काव्य - कोष | Prasad Kavya - Kosh

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Prasad Kavya - Kosh by सुधाकर पाण्डेय - Sudhakar Pandey

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अचला [१] १५७१ २५१, २१२॥ वि०, १७७; (स० ) সত ই০1 निश्चत, स्थिर, टिकाऊ, ठहरा हुमा । श्रयला = का०,२६ १२६। ° सीर वणु पृष्वी। जो न चल, दुहरी हुई, स्थिर (তি) (४०) । साथुमा दा गले मे पटनन का वस्त्र । श्रचानक == कण० २६) का कुऽ १५) कार € १७, [क्रि० विर] २७, ४१, १८४, १८५] ०, १५, (६० ) १६, २६॥ प्रवस्मात्‌, सहमा | श्रचेत = का०, ४७, ४६, ८६ । वि, घ° पुर] चेतनारहितः सज्ञाश्‌-य 1 भ्यावुन, विहन, (६०) नासम, श्रनजान 1 जड । प्रतय । अचेतन = ल०, ३७1 [মি] जिसमे चेतना न हो, बेहोश, जीवन या (से० ) प्राण से रहित । सनारीन । चेतनारदित । अचेतनता = का०) १३२] [० सी°] (९०) नदतः, वेहोशी निष्पाणता । अच्छा = कण) ११११६ | বা कु०) ७६१ ८७। {विर ] म० ४७, ६१ प्रर ५1 म०,२४। ५६० ) लऽ) ११। उत्तम, विया, खरा, चाषा, भला । ठक । वका श्रादमी, श्रे वुस्प । अच्छी = क०, ६। काण कुण, ११६॥। कारः [वि०]्‌ १८०) २११1 ०) ६० | प्रे, ५॥ (सर) श्रच्छा का क्जीलिग | श्रचुते = बा० बु० ६१ | का०, २७१। [ वि? स॒० पु० ] पवित) विना छूमप्वा गया, प्रयाग रहित, (६० ) जा काम मे न लाथा गया हा, नया, वारो | निम्नकोटि का व्यक्ति या जाति; अत्यज अ्रस्वृश्य | पज = चि०) /२१1 [ वि? सं० पुण] अजमा जिसका जाम न हो, स्वयमू (स) (ईश्वर) । कामदेव | ब्रह्मा | विष्णु | शिव | बकरा, भेड़ा | माया, शक्ति । रघु के पुत्र वथा दशरथ के पिता। 'रघुवश” भ कालिदास ने अ्रज इदुमती विवाह, इदुमती मृत्यु एव श्रज विलाप्‌ का ग्रत्यत्त रसात्मक वर्णन किया है | पुराणों मे भी इनको चर्चा है। अजीगते अजगय = काऽ) १८५॥ ५ [० पुण] ( स* } भिवजौ का धनुप, पिनाक | श्रजमेर = দণ্ঃ ২9) [० षन] (हि>) मध्यप्रदेश का एक नपर्‌1 अजय = चि०, ६१1 [० 4०] (घ०) पराजय, हार । अजर अमर = का०, २७० । [भि] ईश्वर का एवं विशेषण। जो जरा- (मर) मरण से रहित हो । अजस्र 5८ ल०, ५६! [ वि० ] (स०) भ्रपरिमित, भ्रत्मधिक। निरतर, सदा। अजहेँ = चि०, १५, ६७॥ [भ्र] श्रमीतक, इस समय तक, भ्राज तक, (রও মা) प्रव भी। अजान का०, ३०, १६३ । चि०, १५२ | ल०, [विण सं° प°] ७४ । (হি) झनजान, भवोध, भनभिनश्न, सोसमझ, अरवूक | जो न जाना जाय | श्रपरिचित, আনান 1 प्रज्ञान, श्रनभिज्ञता। एक प्रकार का पीपल को तरह का ऊंचा पेड़ जिसके नीचे जान स बुद्धि अष्ट हो जाती है। प्रात भसजिद में पुकारे जानंवाने থান | अजित = ल० ७७! [ वि, स० ধু] श्रपराजित, जिसे जात न सकें, जा हार ( स्‌ ) न हो। बुद्ध, शिव, विध्णु। जनिया के दूपर तीयकर | अजिर 5 का०, ६४। ० ३१) ल०२३। [ स० पु० वायु, हवा। হুদা का विपय | (स) श्रागत महन | शरीर । मेढ । अजी = क०3 १८ | का० कु० ८९] [সণ] (০) सवायन मुचक शब्द | टे, धर, जी । হীন = क०) १७। (सण पूर) शुनक्षेपके पिता। अचीगते = भूगुकुत मे उत्पन एक ज्राह्रण, जा शुत पुच्छं शुन नेष श्रौर शुनालागुन--तोब पुत्र का पिता था और वरुण वो षयि दत क॑ लिय झपने पुत्र शुनझ्प का | हरिश्चद क॑ हाथ विक्रय कर दिया




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