सूरसागर-सार | Sursaagar Saar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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%` ^ श्ल শর ভেচা1= লা 1৮वैराग्यजय शी ७ के जीत काने +( स ८ঠা क्म † शक्थ “५कव्य खरा আশেधृर्चागर भारजती, सती, तापस आराबें, खारों बेद হতसूरदास भगव॑त-भजम बिछु. करम-फॉस न कटे ॥२६॥ भादी कांड सो ল হই!ইউ ४४५० , २. कहाँ बह राहु. कहाँ वे रवि ससि, आनि सजग पर !मुनि बसिष्ट पंडित अति ज्ञानी, रचि-पतच्चि लगन घरे । तात-मरव, सिय हरन, राम बन बपु घरि विपति भर ! रावन जीति कोटि सेतीसो, बिश्ुवन राज करे । झूत्युहिं बॉँथि कप मे राज, भावी-ब्रस सो मरे | अरजुन के हरि हुते सारथी, सोऊ बतं निकरं) जपद-खुता को राजसभा, दुस्सासन चीर हरे। इरीबंद सो को जशदातः, सो घर नीच भरे । जी गृह दोड़ि देस बहु घाबे, तउ वह संग फिरे । भावी के बस तीन लोक है, सुर नर देह धरे । सूरदास अथु रचीसु हैः को करि सोच मर ५६३.॥ ताने सेइये श्री जदुराड । संपति बिप्ति, बिपति ते संपत्ति, देह को यह सुभाद !. तस्बर फूल, फर, पतमरे, अपने कालहि पाड । सरचर नीर भरे भरि, उस, सूखे, खेह उद़ाइ । লিলা चंद बढ़त ही बाड़े; घटत-घटत घटि जाइ । सूरदास संपदाआपदा, जिनि कोझ पतिआइ ॥३१॥किते दिन हरि-सुमिर्न बिनु खोर ।पर-निंदा रसना के रस करि, केतिक जनम बिशोएं ।तेल বাত कियो रुचि-सदंन, बस्तर मलि-मल्ि घोए। तिलक बनाई चले स्वामी है, विषयिति केमुख जोए ।काल बली ते सब जग कॉप्यो, अक्षादिक हूँ रोए।सूर अधम की कहो कोन गति, उदर भरें, परि सोए ॥३४५॥तर ते जनभ पाहू कह कीनो ?उदर स्यो करं सकर ल प्रभु कौ माम्त ने खीनी ।श्री भागवत सुनी नहिं भ्रवतनि, गुरु सो्थिं द नहि चीनी । माव-भक्ति कलु हृदय न उपजी, सन विषय में दीनी ।




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